याचिका में कहा गया था कि बाबा रामदेव की दवा कंपनी ने आईसीएमआर की गाइडलाइन का पालन नहीं किया। कंपनी ने आयुष मंत्रालय भारत सरकार की अनुमति भी नहीं ली। आयुष विभाग उत्तराखंड में भी दवा बनाने के लिए आवेदन नहीं किया गया। जो आवेदन किया गया था, वह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया गया था।
इसकी आड़ में बाबा रामदेव ने कोरोनिल दवा का निर्माण किया। कंपनी ने निम्स विश्वविद्यालय राजस्थान से दवा परीक्षण होना बताया गया, जबकि निम्स का कहना है कि उन्होंने ऐसी किसी भी दवा का क्लिनिकल परीक्षण नहीं किया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि बाबा रामदेव लोगों में अपनी दवा का भ्रामक प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। यह दवा न ही आईसीएमआर से प्रमाणित है और ना ही इनके पास इसे बनाने का लाइसेंस है। इस दवा का अभी तक क्लिनिकल परीक्षण भी नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने दवा पर पूर्ण रोक लगाने की मांग की थी।