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आपदा प्रभावित गांवों के पुनर्वास को लेकर बढ़ा झगड़ा

Thu, 25 Jul 2013 08:29 AM IST
देहरादून/ब्यूरो
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आपदा के कारण खतरे की जद में आए गांवों के पुनर्वास को लेकर झगड़ा शुरू हो गया है। कुछ लोग मूल गांव के पास ही पुनर्वास की मांग कर रहे हैं, जबकि कुछ लोगों मैदानी क्षेत्रों में जगह चाहते हैं। दिक्कत यह है कि पुनर्वास को लेकर प्रदेश की नीति भी स्पष्ट नहीं है। लिहाजा यह झगड़ा करीब 400 गांवों के पुनर्वास  की राह का रोड़ा बन सकता है।
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पहले से ही प्रदेश पलायन की समस्या से जूझ रहा है। वहीं 16-17 जून को बदरी-केदार घाटी में आई दैवी आपदा के बाद पलायन का खतरा और बढ़ गया है। अर्थ एवं संख्या विभाग के मुताबिक राज्य गठन के बाद प्रदेश में पहाड़ से मैदान में पलायन तेजी से बढ़ा।

केदारघाटी की आपदा के बाद सालों से यहां जमे जमाए लोग भी पहाड़ को असुरक्षित मानने लगे हैं। दूसरी ओर मैदानी क्षेत्रों की तेज विकास दर ने इन लोगों के अंदर मैदान के प्रति ललक भी पैदा कर दी है। लिहाजा पुनर्वास की बाट जोह रहे गांवों के कई लोग अब मूल गांव की अपेक्षा मैदान को तरजीह दे रहे हैं।
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देहरादून में बसने को उत्सुक
हाल यह है कि जोशीमठ के पास के ही गांव भ्यूंदार के करीब 15 परिवार जोशीमठ और देहरादून में बसने को उत्सुक है। बाकी बचे करीब 84 परिवार मूल गांव के पास ही जमीन मांग रहे है। केदार घाटी में ही विजय नगर और अगत्स्यमुनि कस्बे के लोग देहरादून में बसने के लिए ज्यादा इच्छुक हैं।

पहाड़ के गांवों को पहाड़ में ही विस्थापित करने की बात का यहां विरोध हो रहा है। विजयनगर के निवासी अजेंद्र अजय का कहना है कि सरकार को इस मसले पर गांवों के लोगों की राय लेनी चाहिए। पहाड़ की आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी है ऐसे में लोग यहां रह कर क्या करेंगे।

बदरीनाथ हाईवे पर स्थित गोविंदघाट से पांच किलोमीटर दूर स्थित पांडुकेश्वर के कई परिवार बदरीनाथ में जमीन की मांग कर रहे हैं। वहीं गांव के कुछ परिवार देहरादून में जमीन देने की मांग पर अड़े हैं।  पांडुकेश्वर चार धाम यात्रा से सीधे जुड़ा हुआ है और यहां भगवान बदरीनाथ की शीतकाल में पूजा होती है। इस बार की आपदा में अलकनंदा नदी ने पांडुकेश्वर को खासा नुकसान पहुंचाया है।

सबसे बड़ा रोड़ा
जाहिर है कि मैदान के प्रति ललक और पहाड़ को असुरक्षित मान लेने की भावना अब पुनर्वास की राह का सबसे बड़ा रोड़ा साबित होने जा रहा है। यदि आंकड़ों की बात करें तो पौड़ी और चंपावत जिले की दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर ऋणात्मक रही है। ऐसे में गांवों के लोगों को मैदान में जमीन दी जाती है तो सरकार खुद पलायन को बढ़ावा देती नजर आएगी।
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