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उत्तराखंड सत्ता संग्राम 2022: वाम दलों की नींव तो थी मजबूत, लेकिन नहीं बन पाया ‘लाल किला’

Fri, 26 Nov 2021 04:14 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal भूपेंद्र राणा, अमर उजाला, देहरादून

सार

21 सालों के इतिहास में वामपंथी पार्टियां न तो कोई ‘लाल किला’ बना पाई न जीत का स्वाद चख सकी। विधानसभा चुनाव में हालात यह रहे कि उन्हें 70 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार तक नहीं मिल सके।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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उत्तरप्रदेश के जमाने में पहाड़ी इलाकों में वामपंथी दलों की नींव तो मजबूत थी। लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद इन दलों ने अपनी सियासी जमीन खो दी। 21 सालों के इतिहास में वामपंथी पार्टियां न तो कोई ‘लाल किला’ बना पाई न जीत का स्वाद चख सकी। विधानसभा चुनाव में हालात यह रहे कि उन्हें 70 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार तक नहीं मिल सके। वह एक अदद जीत को तरस गईं।

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जबकि सियासी जानकारों का मानना है कि राज्य गठन से पहले ही आंदोलन और संघर्ष का पर्याय माने जाने वाले उत्तराखंड को वामपंथी दलों के लिए उर्वरा माना जाता था। आज हालात यह है कि वामपंथी दल अपना अस्तित्व बचाने की जंग लड़ रहे हैं। कई क्षेत्रीय दल उनसे काफी आगे हैं। भाजपा और कांग्रेस सरीखे बड़े दलों की आभामंडल में वामपंथी दल खो गए हैं। अभी तक चुनाव में उनकी भूमिका वोटों के समीकरणों को प्रभावित करने तक सीमित रही है। 

चार चुनावों में वामपंथी दलों का बुरा हश्र
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद अब तक हुए चार विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों का बहुत बुरा हश्र हुआ है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(भाकपा), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी(माकपा) और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(माले) ने हर विधानसभा चुनाव में अलग-अलग प्रत्याशी उतारे। तीनों दलों की सियासी जमीन इस कदर कमजोर हो गई कि वे 70 सीटों पर प्रत्याशी उतारने का साहस नहीं कर सकीं।
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लगातार हाशिए पर आते गए वामपंथी दल
उत्तराखंड गठन के बाद हुए चार विधानसभा चुनावों में तीन वामपंथी पार्टियों भाकपा, माकपा और भाकपा (माले) का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। वे राज्य में एक अदद सीट के लिए तरस गए। वर्ष 2002 में वामपंथी दलों ने 14 उम्मीदवार मैदान में उतारे। इन्हें एक फीसदी वोट ही मिले। 2007 विधानसभा चुनाव में 16 उम्मीदवार उतारे। वोट प्रतिशत घटकर 0.59 फीसदी रह गया। 2012 में वामपंथी प्रत्याशियों की संख्या 16 थी, जिन्हें महज 0.58 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। 2017 में वाम पंथी प्रत्याशियों की संख्या केवल 12 थी और इनका प्रदर्शन एक प्रतिशत वोटों पर सिमट गया।

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इस बार मिलकर चुनाव लड़ने का इरादा

हालांकि पिछले चार चुनावों के निराशाजनक प्रदर्शन से सबक लेते हुए तीनों वामपंथी दलों ने मिलकर चुनाव लड़ने का इरादा जाहिर किया। तीनों दलों के नेताओं ने इसकी रणनीति भी बनाई है। लेकिन जानकारों का मानना है कि जमीन पर सांगठनिक नेटवर्क और कार्यकर्ताओं की फौज के बिना गठबंधन के जरिये करिश्मे की उम्मीद बेमानी है। सत्ता पर काबिज भाजपा के सांगठनिक ढांचे के आगे मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी नहीं ठहरती तो वामपंथी दलों की क्या बिसात है, जो अपनी रही-सही सियासी जमीन भी गंवा चुके हैं।

लोकसभा में भी बनाया था मोर्चा
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-माकपा) एक मोर्चा लोकसभा चुनाव के दौरान भी बनाया था।  पौड़ी और टिहरी के दो लोकसभा क्षेत्र से भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी लेनिनवादी) (भाकपा माले) पौड़ी, अल्मोड़ा और नैनीताल लोकसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में थी। तीन-तीन वामपंथी दल होने के बावजूद इन सभी को उत्तराखंड में केवल 26,363 वोट ही मिल पाए।

हाथों से खिसक गई टिहरी की सियासी जमीन
एक दौर था जब टिहरी के एक बड़े हिस्से को वामपंथ के लालदुर्ग के तौर पर देखा जाता था। वहां भाकपा का प्रभाव था। उत्तराखंड में वामपंथी दलों के प्रभाव के लिए टिहरी एक बड़ी नजीर है। उत्तरप्रदेश के समय में चिपको आंदोलन को वैचारिक धार देने वाले भाकपा के गोविंद सिंह नेगी टिहरी विधासनभा क्षेत्र से दो बार विधायक रहे। 80 के दशक में भाकपा नेता व हिंदी के विख्यात कथाकार विद्यासागर नौटियाल देवप्रयाग से विधायक चुने गए। संघर्ष के जरिये जनाधार बनाने वाले इन वामपंथी नेताओं की टिहरी रियासत की निरंकुश राजशाही के खात्मे में बड़ा योगदान रहा है। संघर्ष के ताप से वीर चंद्रसिंह गढ़वाली, शहीद नागेंद्र सकलानी, मोलू भरदारी, गोविंद सिंह नेगी जैसे जन नेताओं ने जनसंघर्षों का नेतृत्व किया।

संघर्ष के दम पर ही बनेगा जनाधार
इतिहास गवाह है कि वामपंथी दलों ने संघर्षों के दम पर ही अपना आधार बनाया। जहां उन्होंने जनता के संघर्षों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और बलिदान दिया, वहां लोगों में उनके प्रति विश्वास बना। टिहरी इसकी सबसे बड़ी नजीर है जहां निरंकुश राजशाही के खात्मे के लिए नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी जैसे युवा कम्युनिस्ट शहीद हो गए।

चार विस चुनावों में वामपंथी दलों का वोट प्रतिशत
वर्ष    भाकपा  माकपा   भाकपा(माले)
2002    0.84   0.30     0.20
2007    0.23   0.25     0.06
2012     0.21   0.27     0.10
2017     0.08   0.08     0.04
नोट: वोट प्रतिशत में। स्रोत: चुनाव आयोग

किस चुनाव में कितने उम्मीदवार
दल       2002   2007    2012    2017
भाकपा   14        03         05       04 
माकपा   05         06       06         06
भाकपा माले 10     07        05       02
स्रोत: चुनाव आयोग
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आजादी के समय से ही रहा वामपंथ असर

उत्तराखंड में कम्युनिस्ट आंदोलन आजादी के समय से ही सक्रिय रहा। टिहरीराजशाही के खिलाफ लड़ाई नागेंद्र सकलानी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे।  इसके अलावा चंद्र सिंह गढ़वाली भी कम्युनिस्ट पार्टी से चुनाव लड़ चुके हैं। भाकपा माले के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी कहते हैं, पहाड़ में कम्युनिस्ट पार्टियां इतनी सक्रिय थी कि टिहरी और उत्तरकाशी इलाके को कभी लालघाटी के नाम से जाना जाता था। कम्युनिस्ट पार्टियों का पहाड़ में खासकर मजदूर आंदोलनों में सक्रिय प्रभाव रहा। पहाड़ में कम्युनिस्ट पार्टियां जल, जंगल जमीन के संघर्ष को लेकर सक्रिय हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में तय हुआ है कि भाकपा, माकपा और भाकपा माले मिलकर चुनाव मैदान में उतरेंगे।

वामपंथी मजदूरों और गरीबों के हितों की लड़ाई लड़ते रहे हैं। लेकिन वर्तमान में सत्ता में इस वजह से नहीं आ पाए हैं कि देश में तथाकथित राष्ट्रवाद के नाम पर जो चल रहा है इससे माहौल मजदूर विरोधी हो गया है। इसके अलावा पूर्व में सीपीआई और सीपीएम के अलग-अलग होने से भी कहीं ना कहीं असर पड़ा। वामपंथी ताकत प्रदेश में सत्ता में नहीं आ पाई।
-राजेंद्र सिंह नेगी माकपा के राज्य सचिव

वामपंथी दल मजदूरों, किसानों, गरीबों और वंचितों की लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन वर्तमान में चुनाव धनबल और बाहुबल के हो गए हैं, यही वजह है कि हम सत्ता की दौड़ में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। हम इस बार प्रदेश की 10 सीटों से चुनाव मैदान में उतरेंगे।
- समर भंडारी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव

प्रदेश में वामपंथी आंदोलन को जिस तरह से खड़ा होना चाहिए था, नहीं हो पा रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि देश भर में सांप्रदायिक ताकतें, पूंजीपतियों की सांठगांठ से वामपंथी आंदोलनों पर असर पड़ा है।
- बच्ची राम कौंसवाल, माकपा, राज्य कमेटी के सदस्य
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