उत्तराखंड विधानसभा का चुनावी इतिहास गवाह है कि जब-जब खंडित जनादेश आया, निर्दलीय विधायकों की मौज आ गई। वरना 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 57 सीटों की प्रचंड जीत के साथ सत्ता में आई। इस चुनाव में धनौल्टी से निर्दलीय जीते प्रीतम सिंह पंवार और भीमताल से राम सिंह कैड़ा को कुछ खास हासिल नहीं हुआ। अंतत: दोनों विधायक भाजपा में शामिल हो गए। वर्ष 2002 में कांग्रेस को 36 सीटों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। उस चुनाव में भी तीन निर्दलीय विधायक चुने गए थे। लेकिन तब कांग्रेस बहुत ज्यादा दबाव में नहीं दिखी।
ये विधायक जीते निर्दलीय
1951 : जयेंद्र सिंह बिष्ट(टिहरी नार्थ), सत्य सिंह (देवप्रयाग), महाराज कुमार बालेंदु (टिहरी साउथ प्रतापनगर)
1957: घनश्याम (बदरीनाथ) व गुलाब सिंह(मसूरी)
1962: मुकंदी लाल (लैंसडौन),
1967: इंद्रमणि बडोनी (देवप्रयाग), आर प्रसाद (एकेश्वर) एमजी गिरी(हरिद्वार) आर स्वरूप(देहरादून)
1977: इंद्रमणि बडोनी (देवप्रयाग)
1980: नरेंद्र सिंह भंडारी (पौड़ी), शिवानंद नौटियाल (कर्णप्रयाग), कुंवर सिंह नेगी (बदरीकेदार) और जसवंत सिंह बिष्ट (रानीखेत)
1985: काशी सिंह ऐरी (डीडीहाट)
1989: काशी सिंह ऐरी (डीडीहाट), करन चंद्र सिंह(काशीपुर), जसवंत सिंह(रानीखेत) रंजीत सिंह वर्मा (मसूरी)
1993: सुरेंद्र सिंह नेगी (लैंसडौन)
उत्तराखंड गठन के बाद चार विधानसभा चुनावों में निर्दलीय
2002: डॉ. शैलेंद्र मोहन सिंघल (जसपुर), गगन सिंह रजवार(धारचुला), कुंवर प्रणव चैंपियन(लक्सर)
2007: यशपाल बेनाम (पौड़ी), राजेंद्र सिंह भंडारी (नंदप्रयाग), गगन सिंह रजवार (धारचूला)
2012: दिनेश धनै (टिहरी), मंत्री प्रसाद नैथानी (देवप्रयाग), हरीशचंद्र दुर्गापाल (लालकुआं), प्रीतम पंवार (यूकेडी)
2017: राम सिंह कैड़ा (भीमताल), प्रीतम सिंह पंवार (धनौल्टी)
विधानसभा चुनाव में निर्दलीयों का वोट प्रतिशत
विस चुनाव - प्रत्याशी - जीते - वोट प्रतिशत
2002 - 346 - 03 - 16.30
2007 - 240 - 03 - 10.81
2012 - 261 - 03 - 12.34
2017- 261 - 02 - 10.38
निर्दलीय चुनाव लड़ना आसान नहीं होता : प्रीतम पंवार
हरीश रावत सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे प्रीतम सिंह पंवार का मानना है कि निर्दलीय चुनाव जीतना आसान नहीं है। निर्दलीय प्रत्याशी को एक-एक वोट के लिए पसीना बहाना पड़ता है। उसका कोई कैडर वोट नहीं होता। पांच साल की तपस्या के बाद जब चुनाव आते हैं तो राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों से टक्कर लेना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। सियासी दल के प्रत्याशी के पास कैडर वोट होता है। संगठन का मजबूत नेटवर्क होता है। इसका लाभ दलों के प्रत्याशी को मिलता है, लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी को ये सारे संसाधन खुद अपने सामर्थ्य से जुटाने होते हैं। जनता के बीच रहना पड़ता है, उनके दुख सुख में साथ खड़े होना होता है।