इसका डिजाइन आईआईटी रुड़की से बन कर आ गया है। अब इस जगह पर सिर्फ दो झीलें और इनके चारों ओर मिट्टी व पेबल से बना कच्चा परिपथ बनेगा, जिससे यहां आने वाला सारा जल भूमि में अवशोषित हो सके। झील की सतह में सीमेंट या टाइल का प्रयोग नहीं किया जाएगा बल्कि बायो डिग्रेडेबल मिट्टी इस्तेमाल की जाएगी, ताकि पानी लंबे समय तक इसमें टिका रहे और धीरे धीरे भूमि में अवशोषित होकर नैनीझील को रिचार्ज भी करता रहे। सीमेंट केवल चारों ओर की दीवार के निर्माण में प्रयुक्त होगा।
निगम के महाप्रबंधक एपी वाजपेयी ने बताया कि नए डिजाइन में यह भी व्यवस्था है कि विशेष ट्रेंचलेस तकनीक से बड़ी झील का अतिरिक्त पानी नीचे की छोटी झील में जाता रहे। हाल की अतिवृष्टि जैसी विपदा में इससे भूमिगत रूप से अतिरिक्त जल की निकासी आसानी से की जा सके जिससे आसपास के भवनों को खतरा न हो।
दो मीटर की खुदाई से टली भारी आपदा
सूखाताल के सौंदर्यीकरण कार्यों के तहत भूगर्भ विशेषज्ञों की सलाह पर इसकी खुदाई कर मलबा हटाया जाना प्रस्तावित था। जीएम वाजपेयी ने बताया कि तमाम लोगों ने निर्माण कार्यों का मलबा यहां भर दिया था। इस स्थल की दो मीटर तक खुदाई करके यह मलबा हटा दिया है। यदि यह खुदाई न कि गई होती तो 1993 की अतिवृष्टि की तरह आसपास के भवनों की एक मंजिल पानी में डूब जाने से कोई बड़ा हादसा हो सकता था। अतिक्रमण भी खुदाई के दौरान हटा दिया गया जिससे झील का क्षेत्र और खुल गया है।