कांग्रेस के साथ पीडीएफ का गठबंधन भले ही उत्तराखंड सरकार में चल रहा, लेकिन लोकसभा सीटों पर प्रचार में यह बिखर गया है।
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दो वर्ष से सरकार को सुरक्षित बनाए रखने वाले कुछ पीडीएफ नेताओं के सुर सतपाल महाराज के कांग्रेस छोड़ने के बाद सुर तीखे हुए थे जो प्रचार में अलग राग लगा रहे हैं।
बसपा को कांग्रेस दो फाड़ करने में कामयाब हुआ लेकिन निर्दलियों और उक्रांद का साथ उन्हें मिलता नहीं दिख रहा है। पीडीएफ के सातों सदस्य चुनाव प्रचार में सरकार से गठबंधन के बजाए अपने राजनीतिक गठजोड़ बैठाने में लगे हैं।
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हरिद्वार लोकसभा सीट पर सीएम हरीश रावत का दांव पीडीएफ के बड़े घटक बसपा पर भारी पड़ा है। बसपा के विधायक सरबत करीम अंसारी को छोड़ अन्य दो मंत्री सुरेंद्र राकेश और विधायक हरी दास कांग्रेस के पाले में हैं।
बसपा से निलंबित सुरेंद्र राकेश और हरी दास चुनाव के बाद किस करवट बैठेंगे यह सबसे महत्वपूर्ण रहेगा। पौड़ी और टिहरी लोकसभा सीट पर पीडीएफ कांग्रेस प्रत्याशियों को नुकसान पहुंचाती दिख रही है।
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टिहरी से विधायक दिनेश धनै को अपने पक्ष में लाने के लिए कांग्रेस के प्रयास कामयाब होते नहीं दिख रहे हैं। धनै को मंत्री पद न तो पूर्व सीएम बहुगुणा दिलवा पाए न ही अब सीएम हरीश रावत।
इसके अलावा टिहरी विधानसभा में कांग्रेस के किशोर उपाध्याय की सक्रियता धनै के अनुकूल नहीं है।
टिहरी में पीडीएफ के उक्रांद विधायक प्रीतम सिंह पंवार से कांग्रेस विशेषतौर पर बहुगुणा परिवार उम्मीदें रखे हुए हैं, लेकिन वह अपने क्षेत्र से बाहर नहीं निकल रहे हैं।
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पौड़ी लोकसभा सीट पर कैबिनेट मंत्री मंत्रीप्रसाद नैथानी की सतपाल महाराज के साथ नजदीकी कांग्रेस प्रत्याशी हरक सिंह के मुश्किलें बढ़ा रही है।
मंत्रीप्रसाद किसी भी राजनीतिक मंच पर नजर नहीं आ रहे, लेकिन ऐसा नहीं है कि वह चुनाव प्रचार से बाहर हैं।
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नैनीताल लोकसभा सीट पर पीडीएफ सदस्य निर्दलीय विधायक और मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल के लिए लखनऊ में एनडी तिवारी के आवास पर भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ से मुलाकात उन्हें खुद को कांग्रेसी साबित करने के लिए फायदेमंद रही।
दुर्गापाल ने मुलाकात पर उटे सवालों पर साफ कर दिया कि वह कांग्रेस के साथ हैं।
16 के बाद गठबंधन की परीक्षा
16 मई को लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के साथ पीडीएफ कांग्रेस गठबंधन की असली परीक्षा होगा। पूर्व सांसद सतपाल महाराज के भाजपा में आने के बाद पीडीएफ को लेकर सवाल खड़े हैं।
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हालांकि कांग्रेस को बहुमत में बने रहने के लिए तीन विधायक चाहिए, लेकिन भाजपा भी नए समीकरण तलाश रही है। ऐसे में कांग्रेस और पीडीएफ में महाराज फैक्टर सक्रिय हुआ तो नई राजनीतिक स्थितियां पैदा हो सकती हैं।