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उत्तराखंड उपचुनाव 2021 : मोदी, शाह, नड्डा ने सीएम ने बनाया, केंद्र तय करेगा कहां से लडूंगा चुनाव : मुख्यमंत्री

Fri, 25 Jun 2021 03:27 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

सांविधानिक मामलों के जानकारों की राय में उत्तराखंड में फिलहाल सांविधानिक संकट जैसी कोई स्थिति उत्पन्न नहीं होने जा रही।
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मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कहा कि उन्हें उपचुनाव लड़ना है और कहां से लड़ना है, इस बारे में केंद्रीय नेतृत्व को निर्णय लेना है। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी है, इसे वह बाखूबी निभाने की कोशिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया कर्मियों से बातचीत कर रहे थे। उपचुनाव से जुड़े प्रश्न पर उन्होंने कहा कि छह महीने में उन्हें उपचुनाव लड़ना है। इस बारे में दिल्ली को निर्णय लेना है। जो निर्णय होगा, उस पर आगे बढूंगा।

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अब राहत है जनता से मिलूंगा
मुख्यमंत्री ने कहा कि अब हालात सामान्य हैं। राहत होने पर अब उन्होंने जनता से मिलने का निर्णय किया है। बकौल सीएम, मैंने जिस दिन शपथ ली थी, उसी दिन जनता दर्शन कार्यक्रम करना चाहता था। लेकिन कोविड के कारण दिक्कतें आईं। लेकिन अब जनता से मिलूंगा तो उनकी समस्याओं को समझूंगा और उनका समाधान करूंगा।

मोदी, शाह, नड्डा ने दी सीएम पद की जिम्मेदी 
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह के बयान कि अब वह बूढ़े हो गए हैं और मुख्यमंत्री के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे से जुड़े प्रश्न पर मुख्यमंत्री ने कहा कि अपना-अपना मत है। केंद्रीय नेतृत्व ने मुझ पर विश्वास किया। प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा ने उन्हें जिम्मेदारी दी, जिसे वह बाखूूबी निभाएंगे। 
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चारधाम यात्रा पर पुनर्विचार कर रहे
चारधाम यात्रा के बारे में पूछे जाने पर मुख्यमंत्री ने कहा कि उस पर पुनर्विचार कर रहे हैं। इस बारे में समाज के सभी वर्गों से बातचीत करेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि दूसरी लहर का किसी को अंदाजा नहीं था। लेकिन सरकार ने डेढ़ महीने में ऑक्सीजन व आईसीयू बेड व वेंटीलेटर की संख्या को आठ गुना कर दिया। कुछ दिनों में राज्य में ऑक्सीजन प्लांट की संख्या 25 से 30 हो जाएगी।

तीसरी लहर पर काबू पाने में कोई दिक्कत नहीं होगी
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार ने संभावित तीसरी लहर की इतनी तैयारी कर ली है कि इस पर काबू पाने में हमें कोई दिक्कत नहीं होगी। वह अपना मुख्यमंत्री आवास भी कोविड के लिए तैयार करने जा रहे हैं। जनता की सेवा के लिए जो भी त्याग संभव होगा उसे वह निश्चिततौर पर करेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि दूसरी लहर को उन्होंने बेहद नजदीक से जाकर देखा। सभी जिलों में गए, पीड़ितों से मिले। जब अपने के पास नहीं गए। मैं उसके बाद भी पीपीपी किट पहनकर एक-एक पीड़ित तक पहुंचा।

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उपचुनाव कराने न कराने का अधिकार आयोग का : कश्यप

उत्तराखंड में खाली हुई गंगोत्री और हल्द्वानी विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराने न कराने का सांविधानिक अधिकार भारत के निर्वाचन आयोग का है। सांविधानिक मामलों के जानकारों की राय में उत्तराखंड में फिलहाल सांविधानिक संकट जैसी कोई स्थिति उत्पन्न नहीं होने जा रही। उनके अनुसार, बेशक आयोग ने कोविड महामारी के चलते उपचुनाव पर रोक लगा रखी है। लेकिन मुख्यमंत्री चाहें तो आयोग को उपचुनाव कराने के लिए पत्र लिख सकते हैं। आयोग उनके पत्र पर केंद्र सरकार के मशविरे पर उपचुनाव कराने या न कराने का निर्णय ले सकता है।

दरअसल, पिछले कुछ दिनों से उत्तराखंड के सियासी हलकों में मुख्यमंत्री और दो खाली सीटों पर उपचुनाव को लेकर सवाल तैर रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत मुख्यमंत्री को छह महीने में विधानसभा की सदस्यता लेनी है। 10 सितंबर को उन्हें छह महीने हो जाएंगे। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए उन्हें चुनकर आना होगा। लेकिन कोविड महामारी के चलते आयोग ने उपचुनाव पर रोक लगा रखी है।

यदि ये रोक बरकरार रहती है तो उपचुनाव के अभाव में मुख्यमंत्री को कुर्सी छोड़नी होगी। विपक्ष का दूसरा सवाल लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 151 के प्रावधान से जुड़ा है। उसका कहना है कि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने में एक साल से कम समय होने पर उपचुनाव नहीं होंगे। इन सवालों और शंकाओं के बीच अमर उजाला ने सांविधानिक मामलों के जानकार प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप से बातचीत की। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में विधानसभा की दो खाली सीटों पर उपचुनाव कराना चुनाव आयोग का सांविधानिक अधिकार है। सीट खाली होने के छह महीने के भीतर आयोग चुनाव करा सकता है। उत्तराखंड के राजनीतिक घटनाक्रम के संदर्भ में कश्यप कहते हैं, स्थान (विस सीट) खाली होने के छह महीने के अंदर चुनाव आयोग को उस स्थान को भरने के लिए उपचुनाव कराने होते हैं, ये उसके विवेक पर है।

मुख्यमंत्री के पास यह विकल्प भी
सुभाष कश्यप के मुताबिक, मुख्यमंत्री के पास बहुमत है। इसलिए वह राज्यपाल से सिफारिश कर सकते हैं कि विधानसभा का विघटन किया जाए और आम चुनाव करा दिए जाएं। चुनाव से पूर्व छह महीने के अंदर कभी भी चुनाव हो सकते हैं। निर्वाचन आयोग के सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री चाहें तो निर्वाचन आयोग को पत्र लिख सकते हैं कि वे उपचुनाव लड़ना चाहते हैं। उनके पत्र पर आयोग उपचुनाव कराने का निर्णय ले सकता है।

यह चुनाव आयोग को तय करना है कि वर्तमान परिस्थितियों में उसे उपचुनाव को लेकर क्या निर्णय लेना है। सांविधानिक व्यवस्था में चुनाव प्रक्रिया को प्रारंभ कराने का सांविधानिक उत्तरदायित्व उसी का है।
-जगदीश चंद, पूर्व विधानसभा सचिव, उत्तराखंड

जब आयोग ने उपचुनाव नहीं कराए
16वीं लोकसभा का कार्यकाल तीन जून 2019 तक था। आंध्रप्रदेश की पांच लोकसभा सीटें 20 जून 2019 को खाली हुई थीं। लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 151 के तहत इन सीटों को छह माह के भीतर भरने के लिए उपचुनाव होने थे। लेकिन आयोग ने खाली सीट और लोस के भंग होने की अवधि एक साल से कम होने की वजह से उपचुनाव नहीं कराए। चुनाव आयोग ने 2017 में नागालैंड में खाली उत्तरी अंगामी विस सीट के लिए विज्ञप्ति जारी की। इसे नागालैंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। चुनौती का आधार लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 147, 149, 150 और 151 ए को बनाया गया। कोर्ट ने कहा कि कानून में दिया गया प्रावधान कहीं भी यह नहीं कहता है कि खाली सीट को भरने के लिए उपचुनाव नहीं होंगे। बेशक खाली हुई सीट की अवधि विस के कार्यकाल से एक साल कम हो। आयोग ने उपचुनाव कराए।
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