उत्तराखंड में खाली हुई गंगोत्री और हल्द्वानी विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराने न कराने का सांविधानिक अधिकार भारत के निर्वाचन आयोग का है। सांविधानिक मामलों के जानकारों की राय में उत्तराखंड में फिलहाल सांविधानिक संकट जैसी कोई स्थिति उत्पन्न नहीं होने जा रही। उनके अनुसार, बेशक आयोग ने कोविड महामारी के चलते उपचुनाव पर रोक लगा रखी है। लेकिन मुख्यमंत्री चाहें तो आयोग को उपचुनाव कराने के लिए पत्र लिख सकते हैं। आयोग उनके पत्र पर केंद्र सरकार के मशविरे पर उपचुनाव कराने या न कराने का निर्णय ले सकता है।
दरअसल, पिछले कुछ दिनों से उत्तराखंड के सियासी हलकों में मुख्यमंत्री और दो खाली सीटों पर उपचुनाव को लेकर सवाल तैर रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत मुख्यमंत्री को छह महीने में विधानसभा की सदस्यता लेनी है। 10 सितंबर को उन्हें छह महीने हो जाएंगे। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए उन्हें चुनकर आना होगा। लेकिन कोविड महामारी के चलते आयोग ने उपचुनाव पर रोक लगा रखी है।
यदि ये रोक बरकरार रहती है तो उपचुनाव के अभाव में मुख्यमंत्री को कुर्सी छोड़नी होगी। विपक्ष का दूसरा सवाल लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 151 के प्रावधान से जुड़ा है। उसका कहना है कि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने में एक साल से कम समय होने पर उपचुनाव नहीं होंगे। इन सवालों और शंकाओं के बीच अमर उजाला ने सांविधानिक मामलों के जानकार प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप से बातचीत की। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में विधानसभा की दो खाली सीटों पर उपचुनाव कराना चुनाव आयोग का सांविधानिक अधिकार है। सीट खाली होने के छह महीने के भीतर आयोग चुनाव करा सकता है। उत्तराखंड के राजनीतिक घटनाक्रम के संदर्भ में कश्यप कहते हैं, स्थान (विस सीट) खाली होने के छह महीने के अंदर चुनाव आयोग को उस स्थान को भरने के लिए उपचुनाव कराने होते हैं, ये उसके विवेक पर है।
मुख्यमंत्री के पास यह विकल्प भी
सुभाष कश्यप के मुताबिक, मुख्यमंत्री के पास बहुमत है। इसलिए वह राज्यपाल से सिफारिश कर सकते हैं कि विधानसभा का विघटन किया जाए और आम चुनाव करा दिए जाएं। चुनाव से पूर्व छह महीने के अंदर कभी भी चुनाव हो सकते हैं। निर्वाचन आयोग के सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री चाहें तो निर्वाचन आयोग को पत्र लिख सकते हैं कि वे उपचुनाव लड़ना चाहते हैं। उनके पत्र पर आयोग उपचुनाव कराने का निर्णय ले सकता है।
यह चुनाव आयोग को तय करना है कि वर्तमान परिस्थितियों में उसे उपचुनाव को लेकर क्या निर्णय लेना है। सांविधानिक व्यवस्था में चुनाव प्रक्रिया को प्रारंभ कराने का सांविधानिक उत्तरदायित्व उसी का है।
-जगदीश चंद, पूर्व विधानसभा सचिव, उत्तराखंड
जब आयोग ने उपचुनाव नहीं कराए
16वीं लोकसभा का कार्यकाल तीन जून 2019 तक था। आंध्रप्रदेश की पांच लोकसभा सीटें 20 जून 2019 को खाली हुई थीं। लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 151 के तहत इन सीटों को छह माह के भीतर भरने के लिए उपचुनाव होने थे। लेकिन आयोग ने खाली सीट और लोस के भंग होने की अवधि एक साल से कम होने की वजह से उपचुनाव नहीं कराए। चुनाव आयोग ने 2017 में नागालैंड में खाली उत्तरी अंगामी विस सीट के लिए विज्ञप्ति जारी की। इसे नागालैंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। चुनौती का आधार लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 147, 149, 150 और 151 ए को बनाया गया। कोर्ट ने कहा कि कानून में दिया गया प्रावधान कहीं भी यह नहीं कहता है कि खाली सीट को भरने के लिए उपचुनाव नहीं होंगे। बेशक खाली हुई सीट की अवधि विस के कार्यकाल से एक साल कम हो। आयोग ने उपचुनाव कराए।