सफल राजनीतिक रैली केबाद भाजपा का प्रदेश संगठन उत्साहित है। इसके आयोजक भी शानदार व्यवस्था से गदगद हैं। वैसे भी मोदी की लहर का साफ असर दिखा। लेकिन इस लहर पर सवार होकर केंद्र में तभी सत्ता कब्जाई जा सकती है जब कामयाबी की खुमारी को त्यागकर अपने पक्ष में दिख रहे माहौल को लोकसभा चुनाव तक जिंदा रखा जाए।
बारी प्रदेश संगठन की
रैली तो हो गई, मोदी अपना काम कर गए लेकिन अब बारी प्रदेश संगठन की है। वास्तव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की रैली ने प्रदेश भाजपा संगठन में ऊर्जा भरने का काम किया। रैली से लोकसभा चुनाव का शंखनाद तो हो गया लेकिन भाजपा पर छाई खुमारी यदि जल्द ही दूर नहीं हुई तो शंख की ध्वनि भी कम होती जाएगी।
लोकसभी चुनाव पर फोकस
अब पूरा फोकस लोकसभा चुनाव पर होगा। भाजपा जिस माहौल को अपने पक्ष में देख रही है उसे बरकरार रखना ही सबसे बड़ी चुनौती है। वैसे भी इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रदेश संगठन व मुख्य नेताओं के कंधों पर होगी। जो समन्वय रैली के लिए दिखाई पड़ा उसे लोकसभा में दोहराना भी बड़ी चुनौती होगा।
एक साथ चलना मजबूरी
मोदी की रैली थीं तो इसलिए सबको एक साथ चलना मजबूरी भी था। क्योंकि रैली केवल प्रदेश संगठन ही नहीं पार्टी केराष्ट्रीय नेतृत्व की अस्मिता से जुड़ी है। जहां भी रैली हो रही है पूरी तरह से पार्टी हाईकमान द्वारा नजर रखी जा रही है। इसलिए अब प्रदेश संगठन की बारी है। और, जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक नहीं हुआ तो ठीकरा भी इन्हीं के सिर फूटेगा। वैसे भी प्रदेश संगठन में कई खेमे समानांतर चलने केकारण आने वाले समय में दिक्कतें आ सकती हैं।