राज्य गठन के बाद अस्तित्व में आई मंगलौर विधानसभा सीट पर बाजी कभी हाजी तो कभी काजी के हाथ लगती रही। इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए इस बार भाजपा ने दो बार के पूर्व विधायक तेजपाल सिंह पंवार के बेटे दिनेश सिंह पंवार को मैदान में उतारा है। पिछले विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरणों में फंसी भाजपा ने त्रिकोणीय मुकाबले में बेहतर प्रदर्शन किया था। बावजूद इसके तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था। अब देखना यह है कि इस बार मंगलौर की जनता किसके सिर पर जीत का सेहरा बांधती है।
लक्सर विधानसभा का हिस्सा हुआ करता था मंगलौर क्षेत्र
मंगलौर विधानसभा सीट राज्य गठन के बाद अस्तित्व में आई थी। इससे पूर्व मंगलौर क्षेत्र लक्सर विधानसभा का हिस्सा हुआ करता था। राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 और 2007 में हुए विधानसभा चुनावों में बसपा से काजी निजामुद्दीन ने लगातार दो बार जीत दर्ज की थी। पहली बार उन्होंने लोकदल के प्रत्याशी और दूसरी बार कांग्रेस के हाजी सरवत करीम अंसारी को हराया था। भाजपा दोनों बार चौथे स्थान पर रही थी। इसके बाद वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में दोनों नेताओं ने पाला बदल लिया था। बसपा से दो बार विधायक रहे काजी निजामुद्दीन ने कांग्रेस का दामन थाम लिया था जबकि हाजी सरवत करीम अंसारी ने बसपा ज्वाइन की थी।
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बसपा के हाजी सरवत करीम अंसारी ने कांग्रेस प्रत्याशी काजी निजामुद्दीन को परास्त कर दिया था और तीसरी बार भी इस सीट पर बसपा का दबदबा रहा। वर्ष 2017 के चुनाव में कांग्रेस के काजी निजामुद्दीन ने बसपा के तिलिस्म को तोड़ते हुए पहली बार मंगलौर विधानसभा सीट को कांग्रेस की झोली में डाल दिया था।
मंगलौर विधानसभा सीट पर तीन बार बसपा और एक बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है जबकि पिछले चुनाव में भाजपा तीसरे स्थान पर थी। इस बार भाजपा के लिए कांग्रेस के काजी निजामुद्दीन और बसपा के हाजी सरवत करीम अंसारी के दो दशकों से चले आ रहे तिलिस्म को तोड़ने की बड़ी चुनौती होगी। हालांकि, वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को 16 हजार से अधिक मत मिले थे।
इसके आधार पर इस बार भाजपा के कुछ नेता अपनी जीत पक्की मान रहे हैं। भाजपा से इस बार करीब 26 कार्यकर्ताओं ने टिकट के लिए आवेदन किया था, लेकिन पार्टी ने गुर्जर समाज के बड़े नेता रहे पूर्व विधायक तेजपाल पंवार के पुत्र दिनेश पंवार पर दांव लगाया है। अब देखना होगा कि भाजपा के दो दशकों से चले आ रहे सूखे को क्या वह खत्म कर पाएंगे, या फिर से हाजी और काजी में से किसी एक सिर पर जीत का सेहरा बंधेगा।