1. राज्य पोषित योजना के तहत अनुबंध किए बिना ही मिलरों से करीब 250 करोड़ रुपये का चावल खरीदा गया।
2. नोडल एजेंसी मंडी समितियों ने मंडी की बजाय बाहर से धान खरीद में सहयोग किया। इससे किसानों को एमएसपी नहीं मिला। मंडियों ने न तो आढ़तियों के खाते जांचे और न ही खरीदे गए धान का निरीक्षण किया।
3. कच्चा आढ़तियों से धान से चावल बनाने की प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया गया।
4. खरीफ सत्र 2015-16 और 2016-17 में राज्य सहकारी विपणन संघ ने जितना धान खरीदा उससे ज्यादा चावल गोदामों में एकत्र किया। मिलरों से 1.18 करोड़ रुपये का चावल लेना टाला गया और 30.38 लाख रुपये का अधिक भुगतान किया गया।
5. खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के केंद्रों ने दो लाख रुपये से अधिक मूल्य का चेक जारी किया, सत्यपान किए बिना खरीद की और कांटे पर तौल की मात्रा से अधिक की खरीद की।
6. स्टेट पूल के गोदामों में भी कई गड़बड़ियां पकड़ी गईं।
7. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के तहत 18.27 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया गया।
8. आढ़तियों और मिलरों ने नए बोरों की प्रतिपूर्ति में 43.38 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान दिखाया।
9. सीएमआर के चावल के ढुलान में करीब 30 लाख रुपये का अधिक भुगतान, राज्य खाद्य योजना के तहत 40 लाख का अधिक भुगतान हुआ।
10. सुखाई कुटाई के मद में 8.63 लाख का अधिक भुगतान, मंडी शुल्क और वेट पर भी स्थिति स्पष्ट नहीं। मूवमेंट चालान और बिलों में भी गंभीर खामियां मिलीं।
10. कच्चा आढ़तियों की खरीद में करीब 30 लाख रुपयेे का अंतर सामने आया है।
11. राज्य सरकार का साफ आदेश था कि धान की खरीद मंडियों में कच्चा आढ़तियों के जरिए होगी।
शासन ने किसानों को किए गए भुगतान की जांच के लिए अलग से कमेटी बनाई थी। इस कमेटी को 2015-16 में 350 में 304 और 2016-17 में 400 में से 361 आढ़तियों ने भी साक्ष्य दिए। 1781 करोड़ रुपयेे का धान खरीदना बताया गया। साक्ष्य न होने के कारण करीब 217 करोड़ रुपये की धान खरीद की पुष्टि नहीं हुई।
नोटबंदी में भी खूब उठाया गया फायदा
रिपोर्ट में यह भी खुलकर सामने आया कि नोटबंदी के बाद करीब 408.45 करोड़ रुपये का नगद भुगतान किया गया। इसमें से 217 करोड़ रुपये के साक्ष्य नहीं मिले। कुल भुगतान का 65 प्रतिशत बैंक के जरिये, 12 प्रतिशत नकद भुगतान नोटबंदी के दौरान और बाकी का 23 प्रतिशत नकद भुगतान नोटबंदी के अलावा किया।