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एक तरफा तलाक से जूझ रही आधी आबादी

Sat, 23 Nov 2013 10:55 AM IST
नलिनी गुसाईं/ अमर उजाला, देहरादून
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देहरादून के शिमला बाईपास रोड पर रहने वाली सुषमा बिष्ट की शादी को 6 साल हो गए। उनकी पांच साल की बेटी है। सुषमा के पति ने उनको कब तलाक देकर दूसरी शादी कर ली वह नहीं जानती।
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एकतरफा तलाक
सुषमा अकेली ऐसी नहीं हैं बल्कि शहर की कई महिलाओं को एकतरफा तलाक से जूझना पड़ रहा है। एकतरफा तलाक में पति के साथ रहने के कारण मामला दबा रह जाता है। मामला खुलने पर ये महिलाएं जिला संरक्षण अधिकारी के पास पहुंचती हैं तो उन्हें ससुराल में रखने, मेंटीनेंस दिलाए जाने आदि को लेकर जद्दोजहद शुरू हो जाती है।

ये हैं मामले
सुषमा ने बताया कि उनके पति हांगकांग में काम करते हैं। उन्होंने गुपचुप वहीं की लड़की से शादी कर ली। इस बीच जब उनको इसकी भनक लगी तो वह तो 5 साल की बेटी के साथ पति के पास पहुंची तो उन्होंने तलाक देने की बात कहकर उन्हें लौटा दिया।
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सुषमा का कहना है कि अब ससुराल वाले भी घर से निकाल रहे हैं। फिलहाल जबरन यहां रह रही हूं। इस बीच वह जिला संरक्षण अधिकारी के पास गईं तो उन्होंने कुछ आर्थिक मदद दी। लेकिन अब सुषमा अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

डोईवाला निवासी किरण अरोड़ा की शादी को तेरह साल हो गए। उनके तीन बच्चे हैं। पति ने एक साल पहले तलाक ले लिया था और करीब 6 महीनों तक साथ रहा। किरण के घर में सब पहले की ही तरह चल रहा था कि अचानक उन्हें लोगों ने बताया कि इन दिनों उनके पति को किसी दूसरी महिला के साथ घूमते देखा गया।

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इस पर किरण को कुछ शक हुआ उन्होंने पति से इसका जिक्र किया। पति ने बताया कि उसने दूसरी शादी कर ली है और इससे पहले एकतरफा तलाक भी दे चुका है। यह सुनकर किरण सन्न रह गईं और अब वह अपने हक की लड़ाई लड़ रही हैं।

ये है एकतरफा तलाक
जो भी पति तलाक लेना चाह रहा है। वह कोर्ट की जरूरी कार्रवाई पूरी करने के बाद यहां से पहुंचने वाले समन को किसी और से रिसीव करा लेता है। ऐसे में कोर्ट को लगता है कि समन पत्नी ही रिसीव कर रही है। तीन बार समन पहुंचने के बाद यदि पत्नी कोर्ट नहीं पहुंचती तो एकतरफा फैसला कर तलाक कर दे दिया जाता है।

नहीं हो रहा नैसर्गिक न्याय का पालन
नैसर्गिक न्याय के तहत जब भी कोर्ट से कोई आदेश होता है तो दोनों पक्षों को सुना जाना चाहिए। एकतरफा तलाक आदेश पारित करते समय न्यायालय की ओर से नैसर्गिक न्याय का पालन नहीं किया जा रहा है जो कि उचित नहीं है।
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- एडवोकेट, दीपेंद्र सिंह

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