आपदा का दर्द झेल चुके पहाडों को अब धमाकों का दर्द भी सहना पड़ रहा है। अगर पहाड़ में सड़कों को बनाने का यह पुराना तरीका न सुधारा गया तो आपदा से कराह रहे पहाडों के जख्म और गहरे हो जाएंगे।
16-17 जून की आपदा के बाद भी कोई सबक नहीं लिया गया। मलबा हटाने के लिए अभी भी डायनामाइट का प्रयोग बदस्तूर जारी है। ऐसे में नदियों के कटाव के कारण आधार खो चुके पहाड़ों के दरकने की रफ़्तार बढ़ जाने की आशंका है।
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उत्तराखंड सरकार इस समय पांचों धामों के लिए वैकल्पिक मार्ग तैयार करने की बात कर रही है। इसके साथ ही नदियों के किनारे की सड़कों को रिअलाइन करने की बात भी हो रही है।
जाहिर है कि आने वाले समय में प्रदेश में सड़क निर्माण का व्यापक कार्य होगा। अधिकारी सड़क निर्माण में करीब चार हजार करोड़ रुपये तक के निवेश का अनुमान लगा रहे हैं। दूसरी तरफ हकीकत यह है कि पहाड़ों में बंद मार्गों को खोलने के लिए डायनामाइट का इस्तेमाल करने से परहेज नहीं किया जा रहा है।
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विशेषज्ञों का साफ कहना है कि रोड कटिंग से पहले पहाड़ की संरचना, रोड अलाइनमेंट, सड़कों के किनारे पानी के चैनल आदि का पूरा प्लान तैयार होना चाहिए।
जबकि प्रदेश सरकार 11 सितंबर से केदारनाथ में पूजा शुरू करने के लिए केदारनाथ और बदरीनाथ के सड़क मार्ग शुरू करने की हरसंभव कोशिश में जुटी है। इसीलिए सड़क खोलने में डायनामाइट का आसान तरीका अपनाने से परहेज नहीं किया जा रहा है।
वहीं भूगर्भशास्त्रियों का साफ कहना है कि सड़क निर्माण में यह जरूर देखा जाना चाहिए कि इससे पहाड़ और कच्चे न हो जाएं। फिर सड़कों का मलबा भी नदी में पहुंचने से रोका जाना जरूरी है।
बिना इन बातों का ध्यान रखे अगर सड़क बनाई जाती है तो यह सड़क कुछ समय बाद ही भूस्खलन का शिकार हो जाती है और हो भी यही रहा है। आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अधिकतर नए भूस्खलन जोन राष्ट्रीय राजमार्ग पर हैं और सड़क चौड़ीकरण का काम शुरू होने से इनकी संख्या में इजाफा हुआ है।
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सीमा सड़क संगठन के मुख्य अभियंता केके राजदान का कहना है कि रोप वे, केबल कार और सुरंग के जरिए भूस्खलन से सड़क बंद होने की समस्या का समाधान बहुत हद तक किया जा सकता है। रोप वे और केबल कार से पहाड़ों पर निर्माण गतिविधि कम होगी और सड़कों पर यातायात का दबाव भी कम होगा।
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