विकानेर, राजस्थान निवासी दोनों हाथ-पैरों से लाचार भगीरथ शर्मा आज अपनी प्रतिभा से किसी के मौहताज नहीं हैं।
कुदरत की इस क्रूरता के बावजूद भगीरथ ने जिंदगी में हार नहीं मानी और विपरीत परिस्थतियों में भी जीने की कला सीख ली। उनकी कुव्वत जिंदगी में संघर्ष से मुंह मोड़ने वालों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है।
बीते सात-आठ वर्षों से ऋषिकेश के लक्ष्मणझूला क्षेत्र में रहने वाले भगीरथ शर्मा बचपन से ही दोनों हाथ-पैरों से अपाहिज हैं। मगर उनके संकल्प और कार्यों में उनकी विकलांगता कभी आड़े नहीं आई। उन्होंने लाचारी के बावजूद दूसरों पर बोझ बनना स्वीकार नहीं किया, बल्कि स्वावलंबी बनकर जीवन जीने का संकल्प लिया।
भगीरथ अपने इस संकल्प से अन्य लोगों के लिए प्रेरक बन गए। वह करीब आठ वर्षों से लक्ष्मणझूला क्षेत्र में रहते हैं। झूला पुल पर अपने चित्रकारी हुनर से विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक और काल्पनिक चित्रों को बनाकर उसमें जीवन के रंग भरते हैं।
विकलांग व्यक्ति की इस जीवटता और हुनर के तीर्थक्षेत्र में आने वाले देसी ही नहीं विदेशी भी कायल हैं। वह भगीरथ की कलाकृतियों पर न सिर्फ मोहित होते हैं, बल्कि उसे खरीदकर उनको हौसला भी देते हैं। उन्होंने बताया कि वह इससे करीब दो सौ रुपये प्रतिदिन तक कमा लेते हैं।
भगीरथ ने बताया कि मैंने विकलांगता को कमजोरी मानकर भिक्षावृत्ति का रास्ता नहीं अपनाया, बल्कि अपने हुनर को तराशकर आजीविका का जरिया बनाया’।
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