हर साल आपदा से जनहानि के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर को हो रहा नुकसान
अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून। हर साल आपदा से प्रदेश को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। जनहानि के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यों को झटका लग रहा है। प्रदेश में आपदा के प्रभावों को कम करने के प्रयास जारी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार आपदा का प्रभाव कम होता है तो प्रगति की राह में और तेजी से कदम बढ़ सकेंगे।
मानसून के समय आपदा इम्तिहान लेती है। इस कारण 2012 के बाद से 243 गांवों के ढाई हजार से अधिक परिवारों को विस्थापित करना पड़ा है। लोगों को अपने गांव से दूर जाने की पीड़ा सहनी पड़ी है। इसके अलावा भूस्खलन, बाढ़ जैसी आपदा में लोगों की जिंदगी की डोर टूटी है। हर साल पुनर्निर्माण में समय के साथ भारी धनराशि लग रही है।
मलबा का सही से हो निस्तारण, भू-तकनीकी सलाह बन सकती मददगार
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पूर्व अधिशासी अधिकारी पीयूष रौतेला ने बताया कि आपदा के प्रभावों को कम करने के लिए जीतना भी काम किया जाए, वह कम ही रहेगा। प्रदेश में सड़क निर्माण समेत अन्य विकास योजनाओं के निर्माण के दौरान जो मलबा निकलता है उसका वैज्ञानिक तरीके से सही निस्तारण हो सके तो काफी राहत मिल सकती है। मलबे के कारण नदियों का तल ऊंचा होता है। कम बारिश होने पर पानी अगर मलबा से मिलता है तो उससे होने वाले क्षति का प्रभाव अधिक बढ़ जाता है। इस दिशा में और अधिक काम किए जाने की जरूरत है।
जीएसआई के पूर्व उपमहानिदेशक त्रिभुवन सिंह पांगती ने बताया कि आपदा को रोका नहीं जा सकता है पर उसके प्रभावों को कम किया जा सकता है। इससे प्रगति और तेजी से होगी। बताया कि पहाड़ में विकास योजनाओं को बनाने से पहले भू-तकनीकी सलाह लेना चाहिए। अगर घर भी बना रहे हैं तो यह देखें कि घर मिट्टी पर बना रहे हैं या पत्थर पर निर्मित किया जाना है। इस पर सरकारी विभाग से लेकर आम लोगों को भी अधिक ध्यान देने की जरूरत है। नदी, गदेरे के पास निर्माण करने से बचना चाहिए।