राष्ट्रीय मिशन के तहत हिमालय को सहेजने के पहले चरण का काम शुरू हो गया है। इसके लिए गठित टास्क फोर्स उत्तर-पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में पहुंच गई।
जलवायु परिवर्तन से जोड़कर नए सिरे से भूस्खलन, भूकंप, झरनों का सूखना, बादल फटना सरीखी हिमालयी घटनाओं के कारणों की छानबीन की जा रही है। साथ ही वन्य जीवों और वनस्पतियों के अध्ययन के लिए वाइल्ड लाइफ वॉच के तहत 10 वन्य जीवों और दो वनस्पतियों का चयन कर लिया गया है।
हिमालयी सिस्टम संरक्षण के लिए गठित टास्क फोर्स का एक घटक वाडिया भूगर्भ संस्थान लीड रोल में है। संस्थान के विज्ञानियों की टीमें उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियरों के पिघलने, मिनरल्स स्रोतों, जल स्रोतों, भूकंप की स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों का अध्ययन कर रही हैं।
वाडिया इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफेसर अनिल कुमार गुप्ता का कहना है कि संस्थान के विज्ञानी पहले शोध कर चुके हैं उनको भी इस अध्ययन में शामिल किया जाएगा। मुख्य रूप से अध्ययन को जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखा जा रहा है।
नए खतरों से बचाव के लिए तैयार होगी कार्य योजना
हिमालयी इको सिस्टम के लिए पैदा हो रहे नए खतरों से बचाव के लिए अध्ययन के बाद कार्य योजना तैयार की जाएगी। भारत में आने वाले संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र का अध्ययन किया जाना है। हिमालयी सिस्टम संरक्षण के दूसरे महत्वपूर्ण घटक के रूप में भारतीय वन्य जीव संस्थान को लिया गया है।
वाइल्ड लाइफ वॉच कार्यक्रम के तहत संस्थान हिमालयी क्षेत्र के वन्य जीवों का अध्ययन कर रहा है। इस कार्यक्रम के तहत 12 वन्य जीवों और दो वनस्पतियों का अध्ययन किया जा रहा है। संस्थान की टीमें भगीरथी बेसिन में काम कर रही हैं। यहां 11 विज्ञानियों और 22 शोधकर्ताओं की टीम काम कर रही है।
वाइल्ड लाइफ वॉच के पहले चरण में हिमालयी क्षेत्र की 12 प्रजातियों का चयन कर लिया गया है। इनमें मछली, मेंढक, जानवर, कीड़े आदि शामिल हैं। विज्ञानी गंगोत्री से भगीरथी तक के क्षेत्र का अध्ययन कर रहे हैं। पहला चरण पांच साल का है। - डॉ. वीबी माथुर, निदेशक भारतीय वन्य जीव संस्थान
हिमालय से सभ्यता का विकास और बचाव जुड़ा हुआ है। विज्ञानियों ने हिमालय सिस्टम के अध्ययन के पहले चरण का काम शुरू कर दिया है। ग्लेशियर, मौसम, जलवायु परिवर्तन सरीखे पर पहले हुए शोधों को भी इसमें शामिल किया जाएगा।
- प्रोफेसर अनिल कुमार गुप्ता, निदेशक वाडिया भूगर्भ संस्थान