वन विभाग की भूमि पर पेड़ काटने के मामले में डीजीपी के खिलाफ बगावती तेवर अपनाने वाले निलंबित दारोगा निर्विकार ने उन्हें दिए गए सभी मेडल वापस लिए की जाने की मांग उठाई है।
दारोगा ने इस संबंध में राज्यपाल को पत्र लिखा और कहा कि एक तरफ शानदार काम के लिए मेडल से नवाजा जाता है और दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने की सजा निलम्बन के रूप में मिलती है।
सस्पेंड दरोगा ने राज्यपाल से न्याय की गुहार लगाते हुए कहा कि इस विरोधाभास को दूर किया जाना चाहिए।
डीजीपी के गलत कामों के विरोध पर मिली सजा
निर्विकार का आरोप है कि उनका कसूर इतना था कि उन्होंने डीजीपी के गलत कार्यों का समर्थन नहीं किया। यही वजह है कि उन्हें हर कदम पर प्रताड़ित किया जा रहा है।
पहले उनका ट्रांसफर रुद्रप्रयाग किया गया। फिर डीजीपी के खिलाफ शिकायतों की जांच के बजाए उन्हें ही निलंबित कर दिया गया।
इससे भी गंभीर बात यह है कि निलंबन आदेश उनके पैतृक गांव और थाने में भिजवाया गया।
'अगर गलत हूं तो वापस लें सेवा पदक'
राज्यपाल को लिखे पत्र में निर्विकार ने अपने सराहनीय कार्यों और मिले सेवा पदकों का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि विभाग की नजर में वे गलत हैं तो उनके सेवा पदक भी वापस ले लिए जाएं।
यदि सरकार ने ये गेलंटरी अवार्ड समेत तमाम मैडल मुझे दिए है और आईबी ने बेहतरीन विवेचना करने के लिए मुझे प्रशस्ति पत्र दिया है तो फिर मैं गलत कैसे हो सकता हूं।
मुझे इसलिए प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है क्योंकि सरकार मेरे साथ न्याय करने के बजाय डीजीपी के भ्रष्ट कार्यो में उनका साथ दे रही है। आखिर रिजर्व फॉरेस्ट से पेड़ काटने वाली जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई क्यों नहीं होती।
पीसी पर रही गहमागहमी
निलंबित दारोगा निर्विकार द्वारा प्रेस वार्ता की अफवाहों के बीच दिन भर गहमागहमी रही। मुख्यालय से लेकर एलआईयू तक यह जानने की कोशिश करती रही कि निर्विकार मीडिया कहां बात कर रहे हैं और उनका एंजेडा क्या है।
तब सरकार ने अनदेखा कर दिया था सत्यव्रत का पत्र
राज्य सरकार ने यदि पूर्व डीजीपी सत्यव्रत बंसल के पत्र का संज्ञान लिया होता तो आज यह नौबत नहीं आती। सत्यव्रत ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर पूरे मामले का विवरण दिया था।
उन्होंने कहा था कि जांच के बाद यह पाया गया कि रिजर्व फॉरेस्ट की भूमि के क्रय विक्रय में कतिपय व्यक्तियों द्वारा दुरभिसंधि कर फर्जीवाड़ा करने की संभावना प्रतीत होती है।
क्षेत्राधिकारी स्वतंत्र कुमार की जांच रिपोर्ट पर तत्कालीन एसएसपी व डीआईजी ने भी गहन जांच की सिफारिश की थी। लेकिन सरकार ने तब नहीं सुनी और बीएस सिद्धू को डीजीपी बना दिया। इसके बाद अब एक मामला हाईकोर्ट में है, एक सीजेएम कोर्ट में और तीसरा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में विचाराधीन है।