उत्तराखंड में लोकायुक्त का मामला अभी भी नाजुक दौर से गुजर रहा है। इस नए कानून में कई झोल हैं जो कि सत्तारूढ़ दल को परेशान कर रहे हैं।
न्यूनतम तीन सदस्यों का समर्थन
सबसे अजीब बात यह है कि संविधान के अनुच्छेद 227 में संशोधन के बगैर न्यायाधीशों को दायरे में नहीं लाया जा सकता उसी तरह से अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों के लिए लोकायुक्त की पूरी खंडपीठ में न्यूनतम तीन सदस्यों का समर्थन होना चाहिए।
संविधान व कानूनों के जानकार इसी बात को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं कि इस बिल में खोट तो है। जूडिशियरी को जबरन डाल दिया गया जो कानूनी रूप से संभव नहीं है। दूसरा सीएम, मंत्री व विधायकों के लिए लोकायुक्त की पूरी पीठ ही कोई फैसला ले सकती है।
नियुक्ति को लेकर दंड देने तक का प्रावधान
इसके अलावा ऑल इंडिया सर्विस (आईएएस, आईपीएस, आईएफएस) के खिलाफ कोई जांच या कार्रवाई करने के लिए न्यूनतम तीन सदस्यों का समर्थन होना लाजिमी है। सीएम, मंत्री और विधायक के बाद ऑल इंडिया सर्विस वाले अफसर भी लगभग बच ही गए। अब बचे निचले स्तर के अधिकारी व कर्मचारी। उनकी सेवा आचरण नियमावली में नियुक्ति को लेकर दंड देने तक का प्रावधान पहले ही मौजूद है।
इसलिए यह एक्ट खासतौर पर उस तबके को छूने की शायद ही हिम्मत करे जिसे दंडित होते देखने की चाहत जनता को हमेशा रहती है। इसके अलावा लोकायुक्त व सदस्यों को नियुक्ति करने के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली सर्च कमेटी ही करेगी। उसमे ज्यादातर लोग सीएम की पसंद के ही रहेंगे। वो सीएम या किसी मंत्री के खिलाफ कुछ करने की हिम्मत करेंगे इसमें भी संदेह है।
संशोधन होने में नहीं कोई अड़चन
हनुमान जनरल मिल्स बनाम हरियाणा स्टेट के मामले में पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी थी कि यदि किसी ऐसे कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती है जिसमें कुछ बहुत ही कठोर व अव्यवहारिक प्रावधान शामिल हो गए हैं, और कानूनी व तकनीकी रूप से उन्हें बदला जाना जरूरी है तो राज्य सरकार उनमें संशोधन कर सकती है। लेकिन संशोधन का ड्राफ्ट राष्ट्रपति को ही भेजना होगा।