मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट पिथौरागढ़ की अदालत ने शनिवार को एक ऐतिहासिक फैसले में डीएनए टेस्ट के आधार पर तीन में से दो को एक व्यक्ति की जैविक संतान करार दिया है।
भरण-पोषण के लिए हर महीने 15 हजार
कोर्ट ने पिता को आदेश दिए हैं कि वह इनमें से एक नाबालिग के भरण-पोषण के लिए हर महीने 15 हजार रुपए अदा करे।
हालांकि पिता के खिलाफ कोर्ट जाने वाली बेटी के बालिग होने और तीसरी संतान की डीएनए टेस्ट में पुष्टि नहीं होने के चलते कोर्ट ने उन्हें मुआवजे का हकदार नहीं माना।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में 12 अप्रैल 2012 को पिथौरागढ़ जिला निवासी किरन रावत की ओर से दंड प्रक्रिया की धारा 125 के तहत वाद दायर किया गया था।
किरन ने अदालत में यह बयान दिया कि उसकी माता जानकी देवी के जीवित रहते हुए पिता गणेश सिंह रावत ने एक महिला को बतौर पत्नी रख लिया थ और उसकी मां जानकी देवी को छोड़ दिया।
भोजन, वस्त्र और आवास की सुविधा भी बंद
इतना ही नहीं उसे भोजन, वस्त्र और आवास की सुविधा देनी भी बंद कर दी थी। कुछ समय बाद जानकी देवी की मृत्यु हो गई थी। किरन पिता की उपेक्षा के कारण अपने दो (नाबालिग) भाइयों के साथ धारचूला से एक गांव में आकर रहने लगी।
किरन ने कोर्ट को यह भी बताया कि पिता की उपेक्षा के कारण उसका तथा उसके भाइयों का जीवन बर्बाद हो गया है। इस मामले में अदालत ने किरन की मौसी विशना देवी के भी बयान दर्ज किए थे।
विशना देवी ने भी कोर्ट को बताया था कि उसकी बहन जानकी की शादी गणेश सिंह के साथ हुई थी। उसके तीन बच्चे हुए थे। गणेश रावत तीनों बच्चों को अपनी संतान मानने से इंकार करता रहा।
इस कारण अदालत ने इस प्रकरण की पुष्टि के लिए तीनों बच्चों और उसके पिता का डीएनए टेस्ट कराया था।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सुनाया फैसला
सारे गवाहों को सुनने और साक्ष्यों को जुटाने के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ओम कुमार ने अपने फैसले में कहा है कि नाबालिग धर्मेंद्र (बदला हुआ नाम) गणेश सिंह का जैविक पुत्र है।
वह धारा 125 के प्रावधानों के अंतर्गत भरण पोषण की धनराशि पाने का हकदार है। गणेश सिंह को अदालत ने आदेश दिया है कि वह नाबालिग को 12 अप्रैल 2012 से प्रतिमाह 15 हजार रुपए की राशि भरण पोषण के तौर पर अदा करेगा।
किरन रावत गणेश सिंह की बेटी तो है, लेकिन बालिग हो जाने के कारण भरण-पोषण की राशि पाने की हकदार नहीं मानी गई, जबकि दूसरे बेटे के गणेश सिंह का पुत्र होने की पुष्टि डीएनए टेस्ट में नहीं हो पाई थी।
इस कारण उसे भी भरण पोषण का लाभ लेने का अधिकारी नहीं माना गया। मुस्कान संस्था के अध्यक्ष जगदीश कलौनी ने अदालत के इस आदेश का स्वागत किया है।