हाथ में चाय की ट्रे लिए जब श्रीनगर की अंजना गुजरती है तो लोग उसकी तरफ प्रशंसा भरी नजरों से देखते हैं।
बेटे की तरह संभाला घर
पिता की मौत के बाद अंजना न केवल परिवार का सहारा बनी, बल्कि अपनी पढ़ाई भी जारी रखी।
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अंजना की मां रूक्मणी कहती हैं कि अंजना ने बेटे की तरह घर संभाला। साथ ही अपनी पढ़ाई भी करती रही।
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मेरी बेटी अनमोल है। अदिति स्मृति न्यास के सचिव गिरीश पैन्यूली कहते हैं कि अंजना स्वाभिमानी है। मदद पर विश्वास नहीं करती। न्यास ने इसीलिए उसके कार्य को सम्मानित किया है।
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वर्षों से वजीरों के बाग के पास चाय की दुकान चलाने वाले गणेश रावत को वर्ष 2010 में गले में कैंसर हो गया। इलाज पर काफी खर्च आया लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी। इसके बाद अंजना को अपनी बड़ी बहन रंजना और मां के गुजारे की चिंता सताने लगी।
मां ने बेटी के फैसले को समर्थन दिया
तब गढ़वाल विवि में बीए तृतीय वर्ष की छात्रा रहते हुए अंजना ने पिता की चाय की दुकान संभालने का फैसला लिया। तंगहाली से गुजर रहे परिवार की मुखिया रूक्मणी देवी ने बेटी के फैसले को समर्थन दिया।
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चाय की दुकान के साथ अंजना अपनी पढ़ाई भी करती रही। बीए के बाद वह एमएसडब्ल्यू का कोर्स कर चुकी है। अब गढ़वाल विश्वविद्यालय में ह्यूमन राइट्स से पीजी कर रही है।