अंग्रेजी के जाने-माने उपन्यासकार पद्मभूषण रस्किन बांड सोमवार को अपना 80वां जन्मदिन सादगी से मनाएंगे।
हर साल बच्चों को ऑटोग्राफ देकर मनाते हैं जन्मदिन
सरल स्वभाव के बांड हर साल अपना जन्मदिन बच्चों को ऑटोग्राफ देकर मनाते हैं। अपने परिवार, मित्र लेखकों के साथ डिनर करते हैं।
जीवन के 80 बसंत पार कर चुके बांड अब भी लेखन कार्य में जुटे हैं। सोमवार को कैंब्रिज बुक डिपो में वे अपनी एक कहानी की पुस्तक ‘जंगल ओमनीबस’ भी रिलीज करेंगे।
यह किताब बांड ने अपने लेखक मित्र दिलीप गुहा को समर्पित की है। रस्किन बांड का जन्म 19 मई 1934 को हिमाचल प्रदेश के कसौली में हुआ।
जामनगर गुजरात, शिमला, देहरादून में उनका बचपन गुजरा। मात्र आठ साल की उम्र में उनके पिता की मौत हो गई थी। तब रस्किन देहरादून में थे। उनकी मां ने दूसरी शादी की।
बांड की कई लघु कहानियां हो चुकी हैं प्रकाशित
बांड की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा देहरादून, मसूरी, जामनगर और शिमला में हुई। बिशप कॉटन शिमला से बांड ने सीनियर कैंब्रिज किया। लगभग सवा सौ से अधिक उपन्यास, कहानी, एंथोलॉजी समेत कई लघु कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं।
वर्ष 1956 में इंग्लैंड में उनकी पहली पुस्तक द रूम ऑन द रूफ के लिए 1957 में जॉन लियानरायम मेमोरियल पुरस्कार से नवाजा गया।
रस्किन बांड ने कई अंग्रेजी के समाचार पत्रों में लेखन का कार्य किया और कुछ अंग्रेजी मैगजीन का संपादन भी किया। वर्ष 1964 में वे मसूरी आए।
पहले किराए के मकान पर रहे, बाद में लंढौर कैंट में आईवी कॉटेज खरीदा और प्रेम सिंह को गोद लिया। आज रस्किन बांड प्रेम सिंह और राकेश के भरे-पूरे परिवार के साथ रह रहे हैं। बांड जीवनभर अविवाहित रहे।
पद्मश्री और पद्मविभूषण से अलंकृत
बांड को वर्ष 1993 में भारतीय साहित्य अकादमी से पुरस्कार दिया गया। वर्ष 1999 में पद्मश्री और 2014 में पद्मविभूषण से अलंकृत किया गया।
दिल्ली सरकार द्वारा 2012 में लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड, गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी की मानद उपाधि से विभूषित किया गया।
बांड के उपन्यास पर श्याम बेनेगल ने ‘एक था रस्टी’ सीरियल बनाया। फिल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज ने ‘सात खून माफ’ फिल्म बनाई।