मौत से क्या डरना, उसे तो आना है, दो दिन की जिदंगी हमें अपना फर्ज निभाना है... यह जज्बा है रुद्रप्रयाग जिले के उन वीर सपूतों का जो भारत माता की रक्षा में प्राण न्यौछावर कर गए।
आजादी की लड़ाई से लेकर देश की सीमाओं की निगहबानी में रुद्रप्रयाग के पराक्रम ने अपना लोहा मनवाया है। जिले में ऐसे सपूतों की कमी नहीं है। आज भी यहां के कई जवान सीमाओं पर सीना ताने खड़े हैं।
रुद्रप्रयाग को सैन्य बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है। यहां के वीर-जवानों ने भारत के गणतंत्र को कायम रखने में अहम भूमिका निभाई है। आजादी के बाद वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध से लेकर वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध और सीमाओं पर चले कई ऑपरेशन में दुश्मन के दांत खट्टे करने में यहां के जवानों के शौर्य को भुलाया नहीं जा सकता।
यहां के युवाओं में सेना के प्रति लगाव
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मातृभूमि के स्वाभिमान और सम्मान के लिए 46 जवान अपने प्राणों की आहुति दे चुके हैं। भारतीय सेना की ओर से इस पराक्रम के लिए 35 सैनिकों को सेना ने कीर्ति चक्र, सेना मेडल और विशिष्ट सम्मान से नवाजा जा चुका है। आज भी यहां के युवाओं में सेना के प्रति लगाव बना है।
अगस्त्यमुनि ब्लाक का मुख्यमंत्री आदर्श गांव कंडारा सैनिक बाहुल्य गांव है। यहां 42 पूर्व सैनिक हैं और 45 से अधिक सेना में तैनात हैं। वहीं तल्ला नागपुर, धनपुर, रानीगढ़ सहित जखोली ब्लाक व केदारघाटी के अधिकांश गांवों से सेना में तैनात हैं।
प्राण न्यौछावर करने वाले जवान
वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध में 1, 1965 भारत-पाक युद्ध में 2 के अलावा ऑपरेशन रक्षक में 15, पवन में 8, पराक्रम में 6, विजय में 3, मेघदूत में 3, कैकटस लिली में 3, रेनू में 1, औलम्पस में 1, बेटल एक्स में 1, ऑरचिट में 1, हिफाजत में 1 सैनिक ने वीरगति पायी।
वीर सिंह को कीर्ति चक्र
वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध में धनपुर पट्टी के पीड़ा गांव निवासी रायफल मैन वीर सिंह ने अपने शौर्य और पराक्रम का लोहा मनवाया। सेना ने उन्हें 24 सितंबर 1962 को कीर्ति चक्र से सम्मानित किया। 26 जवानों को सेना मेडल और 6 जवानों को मेन-इन-डिश से नवाजा गया।