रूपकुंड की अनसुलझी पहेलियों को सुलझने में भले ही वक्त लगे, लेकिन एक बात तय है कि अगर सरकार उदासीन रही तो उच्च हिमालय में स्थित यह झील इतिहास बन जाएगी।
इधर-उधर पड़े हैं ढाई सौ नर कंकाल
हर साल झील का क्षेत्रफल कम होता जा रहा है। कुछ पर्वतारोहियों के दल ने ट्रैक का अध्ययन कर पर्यटन मंत्री दिनेश धनै को रिपोर्ट सौंपी है, जिसका अध्ययन सरकार कर रही है। तीन तरफ से ग्लेशियर से घिरी इस झील में लगभग ढाई सौ नर कंकाल इधर-उधर पड़े हुए हैं।
यहां तक पहुंचना बेहद कठिन है। एक तरफ हो रहे भू-धंसाव के अलावा यहां बढ़ रही मानवीय गतिविधियां भी झील के खतरा बन गई हैं। झील के संरक्षण को जल्द ठोस पहल नहीं की गई तो एक हजार साल पुरानी यह धरोहर विलुप्त हो जाएगी।
अध्ययनकर्ता और ट्रैकर महिपाल सिंह नेगी और अनुराग पंत ने बताया ग्लोबल वार्मिंग के कारण लगातार हिमालयी झील (कुंड) का क्षेत्रफल कम होता जा रहा है। अब केवल कुछ मीटर की ही झील बची है। इस क्षेत्र की अध्ययन की रिपोर्ट पर्यटन मंत्री दिनेश धनै का सौंपी गई है।
यह हैं सुझाव
- देहरादून में म्यूजियम बनाकर नर कंकालों को संरक्षित किया जा सकता है। ऐसे में इन कंकालों को देखने की चाह में यहां पहुंचने वाले लोगों की संख्या में कमी आएगी।
- रूपकुंड में ही नर कंकालों के लिए म्यूजियम बनाया जा सकता है। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि लोग बाहर से ही झील का नजारा देख सकें। झील का ट्रिटमेंट भी जरूरी है। झील का कृत्रिम रूप कहीं और बनाया जा सकता है।
यह एक गंभीर मामला है। रिपोर्ट में काफी कुछ उजागर हुआ है। जल्द ही अध्ययनकर्ताओं और पर्यटन सचिव के साथ बैठक की जाएगी और रूपकुंड को संरक्षित किया जाएगा।
- दिनेश धनै, पर्यटन मंत्री