उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया कि लोग भयभीत हो जाएं और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज न उठा सकें। साथ ही रुड़की व सहारनपुर में मौजूद छावनी से फौज को दूसरी जगह भेजा जा सके।
ऐतिहासिक दस्तावेजों में यह भी उल्लेख है कि इस दौरान अंग्रेजों के खौफ से आसपास के लोग गांव छोड़कर चले गए थे। साल 1910 में शहर के लाला ललिता प्रसाद ने इस वट वृक्ष की भूमि को खरीद लिया था। उसके बाद यहां मंत्राचरणपुर गांव बसाया गया, जो बाद में सुनहरा के नाम से जाना गया।
1947 में जब देश आजाद हुआ, तब तक इस पेड़ पर लोहे के कुंडे एवं जंजीरें लटकी हुई थीं, जो कि बाद में लोगों ने धीरे-धीरे उतार लिए। जिसके निशान इस पेड़ की टहनियों पर आज भी मौजूद हैं।
देश की आजादी के बाद 1957 में पहली बार इस पेड़ के नीचे तत्कालीन ज्वाइंट मजिस्ट्रेट बीएस जमेल की अध्यक्षता में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित कर शहीदों को याद किया गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.यासीन जब तक जीवित रहे, तब तक शहीद यादगार कमेटी के बैनर तले इस वट वृक्ष पर शहीदों को श्रद्धाजलि देते रहे। 1995 को उनके देहांत के बाद उनके बेटे डॉ.मोहम्मद मतीन इस कमेटी के अध्यक्ष हैं, और वट वृक्ष के नीचे कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
सरकार ने की उपेक्षा
ऐतिहासिक वट वृक्ष को शासन-प्रशासन ने पूरी तरह से बिसरा दिया। विधायक निधि से इस वट वृक्ष का सौंदर्यीकरण तो हुआ, पर पहुंच मार्ग बदहाल है। कोई ऐसी पहचान इस पेड़ को नहीं मिल पाई, जिसका यह हकदार है। अब इस पेड़ के नीचे कोई बड़ी सभा आयोजित नहीं की जाती। मात्र कुछ गिने-चुने लोग ही दस मई को यहा शहीदों को नमन करने पहुंचते हैं।
शहीद भी गुमनाम
सुनहरा के वट वृक्ष पर फांसी पर लटकाए गए सौ से अधिक क्रांतिकारी और ग्रामीण गुमनाम हैं। ऐतिहासिक दस्तावेजों में उनके नाम का उल्लेख नहीं है। इतना जरूर लिखा गया है कि ये सभी आसपास के गावों के रहने वाले थे।