कभी देश-दुनिया में शोध क्षेत्र में शिखर पर रहने वाला भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, मुक्तेश्वर (आईवीआरआई, बरेली से संबद्ध) अब वैज्ञानिकों और कर्मचारियों के संकट से जूझ रहा है। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, पिछले 16 सालों में शोध निष्कर्ष के नाम पर कुछ भी नया सामने नहीं आया है।
आईसीएआर के तहत काम करने वाले इस संस्थान ने 2000 में बकरी और भेड़ों को पॉक्स से बचाने के लिए पीपीआर वैक्सीन विकसित की थी। यह शोध उत्तराखंड के साथ-साथ कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल सरकार के लिए मददगार रहा है।
यही नहीं, इसकी तकनीक निजी कंपनियों को भी दी जा चुकी है। पर पिछले 16 साल से संस्थान के कर्मचारियों, वैज्ञानिकों की कमी के चलते अनुसंधान कार्य लगभग ठप पड़ा हुआ है।
आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, संस्थान में वैज्ञानिकों के आठ पद, प्रशासनिक अधिकारी का एक पद, सहायक के आठ पद, तकनीकी कर्मचारियों के 18 पद, कुशल सह कर्मचारियों के 108 पद रिक्त पड़े हैं। आरटीआई में मिली जानकारी में आईवीआरआई मुक्तेश्वर में 2000 में पीपीआर वैक्सीन पर हुए रिसर्च का जिक्र है।
इस पर संस्थान के प्रभारी एबी पांडेय का कहना है कि अनुसंधान के नतीजे पर पहुंचने के लिए लंबी प्रक्रिया होती है और इसमें लंबा समय भी लगता है। एक वैज्ञानिक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मुक्तेश्वर में मूलभूत सुविधाओं की कमी है।
बच्चों की शिक्षा और कई ऐसी जरूरतें होती हैं, जो मुक्तेश्वर जैसे छोटे कस्बे में पूरी नहीं होतीं। यही वजह है कि यहां वैज्ञानिक टिकना नहीं चाहते। इसके चलते कई वैज्ञानिक संस्थान से ट्रांसफर ले चुके हैं।
वैज्ञानिक के कम स्टाफ को लेकर मैं खुद चिंतित हूं और लगातार काउंसिल से बातचीत कर रहा हूं। मैं अपने प्रयासों में लगा हुआ हूं।
- डॉ. आरके सिंह, डायरेक्टर, आईवीआरआई
इन पर चल रहा शोध कार्य
बकरियों की नस्ल सुधार, उच्च पर्वतीय इलाकों में मुर्गी पालन, गाय-भैंसो की जीभ में होने वाली ब्लू टंग बीमारी, पशुओं को चेचक से बचाने के लिए टीका, पशु रोगों के इंसानी प्रभाव पर अध्ययन आदि।