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'मौत' के बीच रहने को मजबूर हैं ये गांव

Fri, 21 Feb 2014 10:34 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
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केदारनाथ आपदा का दंश झेल रहे उत्तराखंड के अति संवेदनशील 337 गांवों अभी भी मौत के बीच रहने को मजबूर हैं। इनका पुनर्वास कब तक होगा यह सरकार को भी नहीं पता।
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हाल यह है कि अभी तक 158 गांवों का ही सर्वे हो पाया है। अलबत्ता सरकार इन गावों के लिए अभी पैसे का इंतजाम भी नहीं कर पाई है।

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विधायक महावीर रांगड़ के सवाल के जवाब में कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य ने स्वीकार किया कि प्रदेश में 337 गांव आपदा के लिहाज से अति संवेदनशील हैं।

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ये वे गांव हैं जिनको संवेदनशील मान लिया गया है। इनमें से कुल 158 गांवों का ही सर्वे हो पाया है। सरकार की कोशिश पहले चरण में अति संवदेनशील गांवों को विस्थापित करने की है।
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कोई समयसीमा तय नहीं

इसी तरह मदन कौशिक की ओर से उठाए गए सवाल के जवाब में कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य ने कहा कि संवेदनशील गांवों को विस्थापित करने के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की गई है।

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पुनर्वास नीति के तहत ऐसे सभी गांवों की रिपोर्ट तैयार करने के आदेश जिलाधिकारियों को दिए गए हैं। यह भी स्वीकार किया गया कि पुनर्वास के लिए अभी सरकार के पास पैसे नहीं हैं। केंद्र से धन उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है।

अभी जमीन तक तय नहीं

मंत्री के इस जवाब से जाहिर है कि आपदा से जूझ रहे गांवों के विस्थापन का मामला अभी अधर में है।

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पुनर्निर्माण के काम को जल्द से जल्द पूरा करने का दावा कर रही सरकार अभी यह तय नहीं कर पाई है कि गांवों का विस्थापन होगा कब तक।

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गांवों के विस्थापन के लिए अभी जमीन भी तय नहीं हो पाई है। प्रभावित गांवों के सर्वे का काम भी अभी अधूरा पड़ा है।
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पुनर्वास में कम नही हैं पेंच

सदन में पुनर्वास में आ रहे पेंच की पहली जानकारी केदारनाथ विधायक शैलारानी रावत ने दी। शैलारानी के मुताबिक सेमी गांव के लोगों के लिए 17 नाली जमीन प्रस्तावित की गई थी।

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इस दौरान गांव की परंपरा के तहत इस नई जमीन की मिट्टी ज्योतिषियों को दिखाई गई । उन्होंने कहा कि इस मिट्टी पर बसने वाले लोगों का वंश नहीं चलेगा। अब गांव के लोग नई जगह पर बसने को तैयार नहीं हैं।

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गुप्तकाशी से कुछ दूरी पर बसे सेमी गांव का हाल यह है कि वहां मकान धंस रहे हैं और लोगों को तंबुओं में रहना पड़ रहा है।
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