फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रामपुर तिराहा कांड: खटीमा में निहत्थे लोगों पर चलाई थीं गोलियां, सात उत्तराखंडी हुए थे शहीद

Wed, 02 Oct 2019 11:43 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खटीमा

सार

  • शांतिपूर्वक तरीके से निकल रहे जुलूस पर पहले रबड़ की गोलियां दागी फिर कर दी फायरिंग
  • तत्कालीन कोतवाली प्रभारी डीके केन ने दिए थे आदेश 
  • राज्य गठन के 18 वर्ष बाद भी शहीदों का स्मारक नहीं बन पाना शहीदों का अपमान
विज्ञापन
रामपुर तिराहा कांड - फोटो : फाइल फोटो
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

हर उत्तराखंडी के जेहन में आज भी वर्ष 1994 के सितंबर महीने की पहली तारीख का वो मंजर ताजा है जब, पुलिस ने बर्बरता की सारी हदें पार करते हुए निहत्थे उत्तराखंडियों पर गोली चलाई थी, जिसमें सात राज्य आंदोलनकारी शहीद हो गए थे, जबकि कई लोग घायल हुए थे। उस कांड के साक्षी रहे लोगों का कहना है कि इस घटना को तत्कालीन कोतवाली प्रभारी डीके केन के निर्देश पर पुलिस कर्मियों ने अंजाम दिया था।

विज्ञापन


खटीमा गोली कांड के शहीदों की याद में हर वर्ष सत्ता से लेकर विरोधी दल के नेता श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए खटीमा पहुंचते हैं। लेकिन इस वीभत्स कांड के 25 साल और राज्य निर्माण के 18 वर्ष बाद भी शहीद स्मारक का निर्माण नहीं होना हर राज्य आंदोलनकारी और शहीदों के परिजनों को सालता है। गौर करने वाली बात यह है कि सीएम त्रिवेंद्र रावत ने शहीद स्मारक की घोषणा की लेकिन उनकी सरकार के ढाई साल बाद भी परवान नहीं चढ़ी है।

एक सितंबर 1994 को उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर सुबह से हजारों की संख्या में लोग खटीमा की सड़कों पर आ गए थे। इस दौरान ऐतिहासिक रामलीला मैदान में जनसभा हुई, जिसमें बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक शामिल थे।
विज्ञापन


जनसभा के बाद दोपहर का समय रहा होगा, सभी लोग जुलूस की शक्ल में शांतिपूर्वक तरीके से मुख्य बाजारों से गुजर रहे थे। जब आंदोलनकारी कंजाबाग तिराहे से लौट रहे थे तभी पुलिस कर्मियों ने पहले पथराव किया, फिर पानी की बौछार करते हुए रबड़ की गोलियां चला दीं। उस समय भी जुलूस में शामिल आंदोलनकारी संयम बरतने की अपील करते रहे।

विज्ञापन

हजारों की संख्या में लोग खटीमा की सड़कों पर आ गए थे

इसी बीच अचानक पुलिस ने बिना चेतावनी दिए अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसके परिणामस्वरूप प्रताप सिंह मनोला, धर्मानंद भट्ट, भगवान सिंह सिरौला, गोपी चंद, रामपाल, परमजीत और सलीम शहीद हो गए और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। उस घटना के करीब छह साल बाद राज्य आंदोलकारियों का सपना पूरा हुआ और उत्तर प्रदेश से अलग होकर नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड के रूप में नया राज्य अस्तित्व में आया।

अलग राज्य का सपना आंदोलनकारियों की शहादत से पूरा तो हुआ लेकिन राज्य गठन से पूर्व देखे गए सपने धरे के धरे रह गए। राज्य में अराजकता, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, अफसरशाही, राजशाही, भूमि विवाद, प्राधिकरण जैसे मुद्दे आज भी पहले की ही तरह हावी हैं। और तो और उत्तराखंड सरकार उन शहीदों की फोटो तक संरक्षित नहीं कर सकी, जिनकी शहादत की बदौलत राज्य बना। आज भी खटीमा गोली कांड के शहीदों को श्रद्धांजलि रेलवे की भूमि पर बने एक चबूतरे में लिखे गए शहीदों के नाम पर दी जाती है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें