पिछले ढाई वर्षों से बाबा रामदेव की पतंजलि योग पीठ देशभर में चर्चा है। चर्चा योग के साथ-साथ अनेक बंदिशों को लेकर चल रही है। जबसे बाबा ने रामलीला ग्राउंड में चार जून 2011 को हल्ला बोला था, तब से केंद्र सरकार उनके पीछे पड़ गई है।
इसका असर पतंजलि परिवार के भीतरी कामकाज पर भी कम नहीं पड़ा है। पतंजलि योग पीठ के सभी पदाधिकारियों को बाबा का मोदी प्रेम रास नहीं आ रहा।
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पतंजलि परिवार के गैर भाजपाई लोग हैरान
याद रहे कि देशभर के लोग योग और प्राणायाम के कारण बाबा से जुड़े थे, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए नहीं। अब जब बाबा खुलकर भाजपा खेमे में आ गए हैं और भाजपा उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगी है, पतंजलि परिवार के गैर भाजपाई लोग हैरान हैं।
उनमें से बहुत से बाबा के प्रतिष्ठानों से किनारा करने का भी मन बना रहे हैं। हाल ही में बाबा के मुखपत्र योग संदेश के संपादक जयशंकर मिश्र संस्थान छोड़कर चले गए हैं।
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पदाधिकारी भी चिंतन के दौर से गुजर रहे
यही मनोदशा कुछ अन्य उच्च पदाधिकारियों की भी बनी हुई है। सूत्रों के अनुसार भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के एक पदाधिकारी भी चिंतन के दौर से गुजर रहे हैं।
बाबा पतंजलि योग पीठ से निरंतर बाहर हैं। अब लोकसभा चुनाव तक न लौटने की बात कह रहे हैं। इसी बीच पतंजलि योग पीठ को अनेक नोटिस भी झेलने पड़े हैं। हाल ही में रामभरत प्रकरण के कारण प्रतिष्ठान की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है।
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पीड़ित कर्मचारी भी मुंह खोलने लगे
यद्यपि बाबा इसे कांग्रेस का षड्यंत्र बता रहे हैं किंतु कई ऐसे अन्य पीड़ित कर्मचारी भी मुंह खोलने लगे हैं, जिन्हें हाल ही में पतंजलि से हटाया गया अथवा हटना पड़ा।
इस संबंध में कोई पदाधिकारी यद्यपि मुंह खोलने को तैयार नहीं, किंतु भीतर की सुरसुराहट अब अधिक मुखर होकर बाहर आ रही है। पतंजलि योग पीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण का मानना है कि पतंजलि के भीतर ऐसा कुछ नहीं है, जो छिपाया जा रहा हो।