राज्य में आए सियासी भूचाल में सांविधानिक संकट के चलते 115 दिनों में तीरथ सिंह रावत की विदाई के बाद भाजपा ने युवा चेहरे और खटीमा से दो बार के विधायक पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा जताया है। पुष्कर के सहारे भाजपा ने जातिगत समीकरणों को तो साधा ही है वहीं कुमाऊं की उपेक्षा के आरोपों का भी जवाब देने की कोशिश की है।
संयोग ही कहा जाएगा कि प्रदेश की अंतरिम सरकार में 123 दिन मुख्यमंत्री रहे भगत सिंह कोश्यारी के कार्यकाल के 19 साल बाद कुमाऊं से उनके ही शिष्य पुष्कर सिंह धामी को प्रदेश की कमान मिली है। हालांकि विधानसभा चुनाव में बेहद कम समय रहने की वजह से धामी के लिए सबको साथ लेकर प्रदेश में विकास की नई इबारत लिखकर सत्ता में भाजपा का कब्जा बरकरार रखने की बड़ी चुनौती होगी।
राज्य गठन के समय अंतरिम सरकार में भाजपा ने गढ़वाल मंडल से वरिष्ठ नेता नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री बनाया था लेकिन 354 दिन के कार्यकाल के बाद कुमाऊं से आने वाले भगत सिंह कोश्यारी (वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल) को प्रदेश की बागडोर सौंपी गई थी। वह सिर्फ 123 दिन ही मुख्यमंत्री रह सके थे। इसके बाद भाजपा ने फिर कुमाऊं से किसी नेता को प्रदेश की बागडोर देने की हिम्मत नहीं जुटाई। वर्ष 2009 में भुवन चंद्र खंडूड़ी, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के बाद वर्ष 2017 में त्रिवेंद्र सिंह रावत और 10 मार्च 2021 को तीरथ सिंह रावत को सत्ता की चाबी सौंपी गई थी।
चारों वरिष्ठ नेता गढ़वाल से ही ताल्लुक रखते हैं। भाजपा में स्व. प्रकाश पंत, बिशन सिंह चुफाल, बंशीधर भगत जैसे दिग्गज नेताओं के लगातार जीतने के बाद भी उनको प्रदेश की कमान नहीं देने पर भाजपा पर कुमाऊं की उपेक्षा के आरोप लगते रहे थे। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल में कुमाऊं के चार जिलों से कोई मंत्री नहीं बनाया गया था। लेकिन तीरथ मंत्रिमंडल में पिथौरागढ़ से बिशन सिंह चुफाल और नैनीताल से बंशीधर भगत को मंत्रिमंडल में जगह देकर भाजपा ने उपेक्षा के आरोपों से बाहर निकलने की कोशिश की थी।
उस समय भी मुख्यमंत्री की दौड़ में पुष्कर सिंह धामी का नाम प्रमुखता से था। बदले सियासी हालात में तीरथ सिंह रावत को इस्तीफा देना पड़ा तो भाजपा ने युवा और जातिगत समीकरणों के आधार पर ठाकुर चेहरे पुष्कर सिंह धामी को प्रदेश की बागडोर सौंपी है। इसे भाजपा की ओर से कुमाऊं के प्रति उपेक्षा के आरोपों का जवाब देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। विधानसभा चुनावों से कुछ समय पहले पुष्कर की ताजपोशी उनके लिए भी बड़ी चुनौती से कम नहीं है लेकिन भाजपा ने ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष के बाद ठाकुर मुख्यमंत्री बनाकर जातिगत समीकरणों के साथ ही कुमाऊं और गढ़वाल में सियासी संतुलन बनाने का प्रयास किया है। देखना है कि भाजपा का यह दांव जनता को कितना पसंद आता है।