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आपदा में नुकसान पहुंचाने वाली साबित हुई परियोजनाएं

Sat, 20 Jul 2013 08:48 AM IST
सुधाकर भट्ट
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16-17 जून को आई आपदा के बाद प्रदेश में रन ऑफ द रिवर परियोजनाओं को लेकर भी बहस खड़ी हो गई है। प्रदेश सरकार हालांकि बड़े बांध के निर्माण की इजाजत देने से तौबा करने की बात कह रही है पर रन ऑफ द रिवर परियोजनाओं पर सहमति जताई जा रही है।
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हाल यह है कि प्रदेश में इस बार की आपदा इन रन ऑफ द रिवर परियोजनाओं पर भी टूटी। इन परियोजनाओं ने नदियों की विकरालता में इजाफा भी किया।

बड़े बांधों को लेकर खासा विरोध था
टिहरी बांध बनने की शुरुआत से ही प्रदेश में बड़े बांधों को लेकर खासा विरोध उठ खड़ा हुआ था। इसके बाद प्रदेश में रन ऑफ द रिवर परियोजनाओं की बात की गई। रन ऑफ द रिवर से मतलब था कि नदियों की मूल धारा से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी, जरूरत पड़ी तो छोटी सी सुरंग बनाई जा सकती है।

पर धरातल पर रन ऑफ द रिवर परियोजनाएं भी पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंचाने वाली साबित हो रही है। जोशीमठ में जेपी की जल विद्युत परियोजना के लिए जोशीमठ के ठीक नीचे से 13 किलोमीटर की सुरंग बना दी गई। खैरी गांव के पास जीएमआर की परियोजना के लिए नौ किलोमीटर की सुरंग बनाई जा रही है।
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गौरा देवी के गांव रेहणी के पास धौलीगंगा में बनी परियोजना में नौ किलोमीटर लंबी सुरंग है। इतना ही नहीं, इन परियोजनाओं को बनाने में अप्रोच रोड, ट्रांसमिशन लाइन, पावर हाउस बनाने में भी नदियों में निर्माण कार्य जमकर हो रहा  है।

इस बार की आपदा में मंदाकिनी और अलकनंदा पर बनी करीब एक दर्जन रन ऑफ द रिवर परियोजनाओं को खासा नुकसान पहुंचा है और मलबे का निस्तारण मानकों के अनुरूप न होने के कारण नदियों की कटाव क्षमता में भी इजाफा हुआ। ऐसे में रन ऑफ द रिवर परियोजनाओं के भविष्य पर भी सवाल उठ खड़ा हुआ है। दूसरी आर हाल ही में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का साफ कहना था कि प्रदेश में अब सिर्फ  रन ऑफ द रिवर प्रोजेक्ट ही बनाए जाएंगे।

क्या है आरओआर परियोजनाएं
-इस तरह की परियोजनाओं में नदी पर सिर्फ इतना सा बैराज बनाया जाता है कि  टरबाइन तक पानी पहुंचाने वाली सुरंग का मुहाना पानी में डूबा रहे। ऐसे में बिजली बनाने के लिए पानी की उपलब्धता नदी के कुल जल प्रवाह पर निर्भर करती है। नदी का पानी सुरंग से होकर फिर नदी तक पहुंच जाता है।

क्या है नुकसान
नदी का प्रवाह कुछ हद तक बाधित होता है। अगर एक साथ कई परियोजनाएं बनें तो नदी में पानी की कई स्थानों पर पानी की कमी हो जाएगी। उत्तराखंड में अलकनंदा और मंदाकिनी में ही 70 से अधिक परियोजनाएं या तो बन रही हैं या प्रस्तावित हैं। कैग की रिपोर्ट में भी  कहा गया है कि इन परियोजनाओं के संचयी प्रभाव का अध्ययन कर लिया जाए।
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