आईएमए प्रदेश महासचिव डॉ. डीडी चौधरी का कहना है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से वार्ता के बाद उनके निर्देश पर ही क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट की जगह उत्तराखंड हेल्थकेयर एस्टेब्लिशमेंट एक्ट का मसौदा तैयार किया गया था। स्वास्थ्य सचिव नितेश कुमार झा को मसौदा सौंप भी दिया गया। आईएमए की ओर से तैयार मसौदे को मुख्यमंत्री को सौंपने के लिए पिछले 15 दिन से समय मांगा जा रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से समय नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में अब डॉक्टरों के सामने आंदोलन के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।
बैठक में आईएमए ने फिर मांग उठाई कि हरियाणा की तर्ज पर राज्य में संचालित 50 बेड तक के अस्पतालों को एक्ट में छूट दी जाए। साथ ही पंजीकरण शुल्क में कमी लाई जाए। प्रदेश अध्यक्ष डॉ. बीएस जज ने कहा कि सरकार डॉक्टरों और नर्सिंगहोम संचालकों की मांगोें को दरकिनार कर अड़ियल रवैया अख्तियार कर रही है। ऐसे में अब डॉक्टराें के सामने अस्पताल को खुद ही बंद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि बड़े अस्पतालों के लिए तो क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट का पालन करना थोड़ा आसान है, लेकिन छोेटे अस्पतालों के लिए मुसीबत है। बता दें कि इससे पहले भी निजी अस्पताल संचालकों ने 13 नवंबर से तालाबंदी का एलान किया था। इसको देखते हुए मुख्यमंत्री ने आईएमए पदाधिकारियों को वार्ता के लिए बुुलाया था। उन्होंने पदाधिकारियों को ‘उत्तराखंड हेल्थकेयर एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ का मसौदा तैयार करने को कहा था।