मलिन बस्तियों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच भले ही शह मात का खेल चल रहा है। लेकिन इन बस्तियों का होगा क्या यह किसी को नहीं मालूम।
कांग्रेस सरकार एक ओर मालिकाना हक का वादा कर रही है तो दूसरी ओर नदियों के किनारों को सजाने-संवारने के लिए बस्तियों को तोड़ने की तैयारी भी है। वहीं सियासी फायदे के लिए भाजपा भी हाथ पैर मार रही है।
मलिन बस्तियों के नियमितीकरण के लिए संसदीय कार्य सचिव व विधायक राजकुमार की अध्यक्षता में उत्तराखंड मलिन बस्ती विकास समिति का गठन किया गया है। ऐसे में, बस्ती वासियों में उम्मीद जगी है कि उनके अवैध मकान वैध हो जाएंगे। उनकी जमीन की रजिस्ट्री होगी।
लेकिन एमडीडीए के रिवर फ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को मंजूरी के बाद सरकार की नीयत सवालों के घेरे में है। प्रोजेक्ट के पहले चरण का सर्वे पूरा हो चुका है। योजना के तहत बिंदाल और रिस्पना नदी के किनारे डेढ़ किलोमीटर क्षेत्र साबरमती नदी की तर्ज पर विकसित किया जाएगा।
इसके लिए नदी के किनारों पर डेढ़ सौ मीटर क्षेत्र से मलिन बस्ती वासियों को विस्थापित किया जाएगा। पहले चरण में नदी किनारे डेढ़ किलोमीटर क्षेत्र ही प्रोजेक्ट के दायरे में आएगा, लेकिन बाद में इसका विस्तार होना है। ऐसे में, सरकार को शहर में 14 हजार फ्लैट बनाने होंगे, जो अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट साबित होगा।
इसके लिए जमीन भी चाहिए और अरबों रुपये भी, जो फिलहाल सरकार के पास नहीं है। कुल मिलाकर मलिन बस्तियों का भविष्य क्या होगा, यह किसी को पता नहीं, लेकिन सियासी फायदे के लिए दोनों पार्टियों ने मोर्चा संभाला हुआ है।
कांग्रेस का दांव
कांग्रेस सरकार ने मलिन बस्तियों के लोगों को मालिकाना हक का सपना दिखाया है। बस्तियों को नियमित करने के लिए उत्तराखंड मलिन बस्ती विकास समिति का गठन किया है। सरकार के वादे और समिति के दावों के भरोसे लोगों को उम्मीद है कि उनके घर वैध हो जाएंगे।
भाजपा का पलटवार
भाजपा का दावा है कि कांग्रेस सरकार मलिन बस्तियों में रहने वाले 14 हजार परिवारों को सब्जबाग दिखा रही है। सरकार की मंशा सही होती तो नियमितिकरण का काम निपट गया होता। सरकार की कथनी और करनी में अंतर को मुद्दा बनाकर भाजपा मंगलवार को सचिवालय कूच कर रही है।
कड़वी हकीकत
मलिन बस्तियों के नियमीतिकरण के वाद से इतर हाल ही में सरकार ने एमडीडीए के रिवर फ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है। प्रोजेक्ट के तहत नदियों के सुंदरीकरण के लिए मलिन बस्तियों में रहने वाले 14 हजार परिवारों को विस्थापित किया जाना है, जो मौजूदा स्थितियों में मुमकिन नहीं लगता है।
आमने-सामने
सरकार साफ कर चुकी है कि किसी भी बस्ती को न तोड़ा जाएगा और न विस्थापन होगा। ऐसे में, एमडीडीए के प्रोजेक्ट का कोई औचित्य नहीं है। मुख्यमंत्री से भी वार्ता हो चुकी है। प्राधिकरण वहां पर प्रोजेक्ट लाए जहां पर विस्थापन की जरूरत नहीं है।
- राजकुमार, अध्यक्ष, उत्तराखंड मलिन बस्ती विकास समिति
गुजरात की साबरमती नदी के आसपास से मलिन बस्तियों का विस्थापन किया गया था। दून में भी हम ऐसा ही करेंगे। पहले चरण में सर्वे किया जा रहा है। धीरे धीरे सभी बस्तियों का विस्थापन किया जाएगा।
- आर मीनाक्षी सुंदरम, उपाध्यक्ष, मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण