दैवी आपदा के बाद प्रभावित क्षेत्रों में बेहतर काम करने वालों को सम्मान देने में भी सरकार का सौतेला व्यवहार सामने आया।
हाकिम और मुलाजिम खुलकर न बोले
यूपी के आधा दर्जन पीसीएस अफसरों का तो जिक्र भी नहीं, इसके अलावा जिन हाकिमों व कार्मिकों ने प्रभावित क्षेत्रों में जीवटता दिखाई उनका नाम लेने वाला भी सम्मान समारोह में कोई नहीं था। आचरण सेवा नियमावली से बंधे हाकिम और मुलाजिम भले ही खुलकर ना बोले, लेकिन आक्रोश आज दिन भर छलकता रहा।
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वहीं, बागेश्वर जैसे जिले में जहां आपदा का दंश नहीं था वहां के भी कई अधिकारी सम्मानित हुए। सम्मान की सूची में कई हकदार हाकिमों की अनदेखी हुई। आईजी लॉ एंड ऑर्डर रामसिंह मीणा 12-14 दिन तक आपदा प्रभावित क्षेत्रों में कैंप कर रेस्क्यू का हिस्सा बने रहे।
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एसपी पीएचक्यू नीलेश भरणे व डिप्टी एसपी स्वपन किशोर आपदा के बाद भी शवों के निस्तारण में 10-12 दिन तक केदारघाटी में डटे रहे। सुर्खियों में रहे गौरीकुंड चौकी इंचार्ज हेमेंद्र रावत ने अपनी टीम के साथ आपदा शुरू होते ही सीमित संसाधनों के साथ काम शुरू कर ढाई से तीन हजार लोगों को गौरीकुंड से गौरीगांव की तरफ सुरक्षित भेजा।
पीएचक्यू की नाकामी सामने आई
दो स्थानीय नागरिक योगेंद्र राणा व ब्रजमोहन बिष्ट ने भी रेस्क्यू के दौरान सैकड़ों लोगों को हेलीपैड तक पहुंचाया, लेकिन दो दिन केदारनाथ जाकर मीडिया में जगह पाने वाले तो सम्मानित हुए मगर इन सूरमाओं को भुला दिया। इसमें पीएचक्यू की नाकामी पूरी तरह सामने आई।
आईएएस अफसर रविनाथ रमन, सचिन कुर्वे, वी.षणमुगम, श्रीधर अद्दांकी बाबू आदि ने उन्होंने मौकेपर जाकर गजब की कार्यक्षमता का परिचय दिया, लेकिन इनकी किसी को याद भी नहीं आई। केमवीएन के एमडी दीपक रावत पिथौरागढ़ के धारचूला में जमे रहे।
कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर आरके सुधांशु का नाम लेने वाला भी कोई नहीं था। इसके अलावा जिन्होंने देहरादून से रेस्क्यू में योगदान दिया उनकी भी अनदेखी हुई।
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