कैबिनेट में लाया जाएगा प्रस्ताव
उन्होंने कहा कि चारा विकास नीति को लागू करने का उद्देश्य राज्य के पशुपालकों को वर्षभर में गुणवत्ता युक्त पशुचारा उपलब्ध हो सके। चारा नीति का क्रियान्वयन के लिए नोडल पशुपालन विभाग होगा। जबकि कृषि विभाग, सहकारिता, दुग्ध उत्पादक सहकारिता संघ, मंडी परिषद व वन सहायक विभाग होंगे। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित नीति पर किसानों से सुझाव लेने के साथ ही रायशुमारी की जाएगी। जिसके बाद नीति का प्रस्ताव कैबिनेट में लाया जाएगा। इस मौके पर सचिव पशुपालन डॉ. बीवीआरसी पुरुषोत्तम, निदेशक डॉ. प्रेम कुमार आदि मौजूद थे।
नीति में ये है खास
प्रस्तावित चारा नीति में भूसा भेली के निर्माण और भंडारण को बढ़ावा दिया जाएगा। चारा बैंकों को भूसा क्रय करने व भंडारण के लिए 10 करोड़ की रिवाल्विंग फंड स्थापित किया जाएगा। आपदा काल या चारे संकट के दौरान रिवाल्विंग फंड से भूसा भेली निर्माण इकाईयों को प्रति क्विंटल के हिसाब से 500 रुपये अनुदान दिया जाएगा।
पशुपालकों व चारा उत्पादक संगठनों को निशुल्क बीज दिया जाएगा। साइलेज निर्माण में प्रयोग होने वाले हरा चारे को उपलब्ध कराने वाले सहकारी फेडरेशन में पंजीकृत किसानों को प्रति एकड़ हरा चारा उत्पादन पर 10 हजार रुपए और पर्वतीय जिलों में चारा उत्पादन के लिए प्रति नाली एक हजार रुपये प्रोत्साहन धनराशि प्रति वर्ष दी जाएगी।
साइलेज निर्माण मशीन के लिए 75 प्रतिशत सब्सिडी देने का प्रावधान किया जाएगा। इसके अलावा पर्वतीय क्षेत्रों में अकृषि व कृषि भूमि पर सघन चारा वृक्ष भीमल, खडीक, शहतूत, कचनार, मोरिंगा समेत अन्य चारा प्रजाति पौधे लगाने पर तीन साल के बाद एक हजार रुपये प्रति वृक्ष प्रोत्साहन दिया जाएगा।
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सरकार की ओर से संचालित फीड ब्लाक निर्माण इकाई को भूसा क्रय के लिए नियमावली में शिथिलता दी जाएगी, जिसमें बाजार सर्वे पर विभागीय अधिकारियों को प्रतिदिन दस लाख तक भूसा क्रय करने की अनुमति होगी। सितारगंज व कोटद्वार में एक हजार मीट्रिक टन क्षमता का काम्पैक्ट फीड ब्लाक निर्माण इकाई स्थापित की जाएगी। श्रीनगर, चिन्यालीसौड, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा व चंपावत में चारा वितरण बैंकों की स्थापना की जाएगी।