ज्योतिषाचार्य गौरव आर्य के अनुसार, हाईटेक युग में पुरातन विषय ज्योतिष भी विज्ञान के दायरे में आ गया है। अब विश्वविद्यालयों में ज्योतिष सूत्रों पर शोध भी हो रहेे हैं, लेकिन किसी ने इस भ्रांति के बारे में सोचने की जहमत नहीं उठाई कि पितृपक्ष में किसी वस्तु की खरीदारी न करने का क्या आधार है।
यह कब से चली, किसने चलाई? किसी पंडित ने बताई तो किस शास्त्र के आधार पर बताई। इस बारे में किसी ने कोई सवाल ही नहीं उठाया। बस तमाम अन्य भ्रांतियों की तरह यह भी रूढ़ि में प्रचलित हो गई। नतीजतन पूर्वजों के स्तुतिगान के बजाय श्राद्ध को हव्वा मान लिया गया।
ज्योतिषाचार्य के अनुसार शास्त्रों में स्पष्ट वर्णित है कि श्राद्ध पक्ष पितरों के प्रति चिंतनशील और श्रद्धावान रहने का काल है, न कि भ्रम पालने का। विद्वानों का कहना है कि श्राद्धकाल में किसी वस्तु के खरीदने-बेचने अथवा नया काम करने की कोई मनाही नहीं है।
भविष्य पुराण, कूर्म पुराण और हरिवंश पुराण का हवाला देते हुए आचार्य ने बताया कि श्राद्ध पक्ष में किसी सामान के क्रय-विक्रय, व्यापार का प्रारंभ, मुहूर्त, नए आभूषण, पौधारोपण, अन्नप्राशन और नामकरण पर कोई रोक नहीं है। केवल विवाह, प्राण-प्रतिष्ठा और गृह प्रवेश की मनाही है।
काशी विश्वनाथ पंचांग में भी उल्लेख है कि श्राद्ध पक्ष पूर्वजों के आशीर्वाद का समय है। इस काल में पितरों की पसंद ही नहीं, बल्कि अपनी पसंद का कोई सामान पितरों का स्मरण कर खरीदें तो उस पर पितरों का आशीर्वाद बरसता है। यह काल पूर्वजों के स्तुतिगान का है न कि भ्रांति पालने का।
श्राद्ध में क्रय-विक्रय के शुभ योग
आचार्य ने बताया कि 15 सितंबर को सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। 17 सितंबर को स्थायी जय, स्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि का योग है। श्राद्ध काल में द्विपुष्कर योग भी है। 18 सितंबर को यायी योग है। इन शुभ योग में नया वाहन, नवीन आभूषण, कपड़ा, जमीन या अन्य वस्तुओं की खरीद पर पितरों का आशीर्वाद बरसता है।