केदारघाटी में राहत कार्यों में लगे हेलीकॉप्टरों के पायलट भी प्रदेश सरकार और सरकारी तंत्र की तरह काफी दबाव में हैं। यही वजह है कि वे डीजीसीए (डायरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन) के नियम भी ताक पर रखकर काम कर रहे हैं। यहां तक कि कई पायलट अपने तय घंटों से ज्यादा उड़ानें भर चुके हैं।
वहीं, केदारघाटी में लगातार बने रहने से वहां का मंजर भी उनकी मन:स्थिति पर असर डाल रहा है।
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केदारनाथ में पिछले 10 साल से हेलीकॉप्टर उड़ान भर रहे हैं, लेकिन कभी कोई दुर्घटना नहीं हुई। जबकि पिछले एक महीने में तीन हेलीकॉप्टर क्रैश हो गए। इन दुर्घटनाओं का मुख्य कारण खराब मौसम को ही माना जा रहा है। ऐसे में ये घटनाएं डीजीसीए और सरकार दोनों के लिए सबक हैं।
क्योंकि सरकार विपरीत मौसम में भी हर कीमत पर केदारनाथ मंदिर की साफ-सफाई कर पूजा शुरू कराने को आतुर है और इसके लिए उपकरणों, कार्मिकों और उनके लिए राशन आदि पहुंचाने का दबाव हेलीकॉप्टर के पायलट पर है। जिससे पायलट अपने लिए बने नियमों को भी लांघ जा रहे हैं। इसका नतीजा रहा कि अब तक 22 मौतें सिर्फ हेलीकॉप्टर दुर्घटना से हो चुकी हैं। गौरतलब है कि डीजीसीए के साफ निर्देश हैं कि विजिबिलिटी (दिखना) कम हो तो किसी भी स्थिति में हेलीकॉप्टर न उड़ाएं, भले ही किसी का भी दबाव हो।
दोतरफा दबाव
माना जा रहा है कि राहत और बचाव कार्यों में लगे हेलीकॉप्टर के पायलट दोतरफा दबाव में हैं। किसी के फंसे होने की स्थिति में उसे निकालने या उसके लिए राशन पहुंचाने का दबाव है। वहीं एक महीने से लगातार काम करते रहने की थकान भी है। ज्यादातर पायलट एक महीने में 100 घंटे से भी ज्यादा की उड़ानें भर चुके हैं।
इस सीजन में केदारघाटी में पहले कभी हेलीकॉप्टर नहीं उड़ते थे। इस बार आपदा के चलते हेलीकॉप्टर उड़ रहे हैं। पायलट के लिए कुछ मानक होते हैं, उनका पालन जरूरी होता है। इसलिए उन्हें बीच-बीच में रेस्ट दिया जाता है।
- कैप्टन भूपेंद्र, पायलट
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