16-17 जून को आई आपदा से पहले केदारघाटी (केदारनाथ) में ‘जेठ में चुका देंगे’ तकिया कलाम हुआ करता था। जेठ मतलब मई।
बिना झंझट के गुजर जाता था पूरा साल
मई में केदारनाथ यात्रा शुरू होती है और इस यात्रा के चार माह के भरोसे केदार घाटी के लोगों का पूरा साल बिना किसी झंझट के गुजर जाया करता था। पर अब आपदा ने लोगों को इस कदर हतोत्साहित कर दिया है कि सालों से चली आ रही यह पंरपरा भी इस बार टूट गई।
पढ़ें, इस तुगलकी फरमान ने उत्तराखंड में फैलाई 'अराजकता'
केदार यात्रा शुरू होने के सरकारी दावे पर लोगों का विश्वास नहीं रह गया है और ऐसे में पूरे क्षेत्र का आर्थिक समीकरण भी गड़बड़ा गया है। चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी जिले तो चार धाम की यात्रा से सीधे जुड़े हुए हैं।
एक बार यात्रा शुरू होती थी तो ढाबे वाले से लेकर हैलीकॉप्टर की बुकिंग करने वाले के लिए पैसा कमाने का जरिया बन जाता था। पर सबसे अधिक मार केदार घाटी के लोगों पर पड़ी। केदारयात्रा इनके लिए एक स्टांप की तरह थी।
पढ़ें, 'भारत की जनता के लिए मोदी से बेहतर कोई नहीं'
मदमहेश्वर घाटी के गांव राउंलेक के जसपाल के मुताबिक बच्चों की पढ़ाई लिखाई से लेकर मकान बनाने तक का काम केदार यात्रा के भरोसे ही किया। इस बार यात्रा केवल डेढ़ माह चली थी और घोड़े खच्चर का काम करते हुए ही दो लाख रुपए कमा लिए थे।
सरकार के दावों पर किसी को विश्वास नहीं
उनियाणा के रामेश्वर का भी यही कहना है। केदार यात्रा का मतलब इन लोगों के लिए साल भर का उधर चुका करने का भी सबब था। मुसीबत यह है कि अगली केदार यात्रा के सरकार के दावे पर घाटी में शायद ही कोई विश्वास करें।
पढ़ें, नदी के उफान को मात देकर 'बेटी' ने बचाया
केदारयात्रा का जिक्र आता है तो लोग टूटी हुई सड़क, मकान, दुकान आदि की ओर इशारा करने लगते हैं। इनका कहना होता है कि छह माह में यह नहीं हुआ। अब तो समय ही नहीं रह गया है।
पढ़ें, मायके में ही लुट गई अस्मत
बिना इनके यात्रा कैसे होगी। यात्रा होगी नहीं तो उधार किस बात का। लिहाजा जेठ में चुकता करने के वादे पर किसी का भरोसा नहीं रहा।