एक तरफ पहाड़ से पलायन हो रहा है वहीं कुछ को यहां की धरती ऐसी भाई कि सैकड़ों किमी दूर से यहां आए यहीं बस गए। बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश के कई प्रवासियों का यहां आकर बसना पहाड़ से पलायन करने वालों के लिए सीख भी है।
उत्तराखंड की धरती में कुछ ऐसी खास बात है, जिसके चलते उनके परिवार न केवल आकर्षित हुए हैं, बल्कि कम समय में उन्होंने यहां आशियाना भी बना लिया है। ठौर-ठिकाना बनाने में प्रवासी महिलाओं का खासा योगदान रहा है।
ऐसी कुछ चुनिंदा प्रवासी महिलाओं ने अमर उजाला से दिल की बात कही, तो हल्द्वानी जैसी छोटी तहसील की 14 साल पहले और अब की स्थिति सामने आ गई।
बिहार के शिवहर (करीब 1100 किमी दूर) की उषा कुमार 30 अक्तूबर, 2000 को यहां आ गई थीं। वह समाजसेविका और कुमार ई सॉल्यूशन की प्रोपराइटर भी हैं। उषा बताती हैं कि जब नैनीताल में हनीमून मनाने आई थी, तभी यहां की प्रदूषण मुक्त आबोहवा और शांति पसंद आई और बसने की इच्छा जगी थी।
फिर एक समय ऐसी स्थिति आई जब दो बच्चों की पढ़ाई भी करानी थी और पति का सेटलमेंट भी करना था। सर्वे के बाद उन्होंने हल्द्वानी को बसने के लिए चुना। बच्चों का बिड़ला स्कूल, नैनीताल में एडमिशन कराया और खुद भी उसी स्कूल में पढ़ाने लगीं। गंगा एनक्लेव में मकान बनाया, जहां पति मुकेश कुमार सीए की प्रैक्टिस करते हैं।
देवभूमि में साकार हुए प्रवासियों के सपने
प्रगति चैरिटेबल सोसाइटी चलाने वाली और लायनेस क्लब की सचिव उषा बताती हैं कि अब दोनों बच्चे सेटल हो गए हैं। पति का काम भी अच्छा चल पड़ा है। उनका कहना है कि यहां आने के बाद लगा हम सचमुच देवभूमि में आ गए हैं। मध्यम वर्गीय परिवार के रहने के लिए यह अच्छा शहर है।
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की पूनम आर्या इको टाउन में बस गई हैं। पति वन निगम के इको टूरिज्म अनुभाग, रामनगर में तैनात हैं। वह 1995 में ही यहां आ गई थीं, तब से कई वर्षों तक किराए पर रहीं। तंग हाल से संघर्ष करते हुए एक बेटे और बेटी को इंजीनियर बनाकर उन्हें सेट करने में कामयाबी हासिल की है। एमवे बिजनेस में प्लेटिनम का तमगा हासिल कर उन्होंने खुद भी कर्मठता दिखाई है।
पूनम बताती हैं यह सब इसी शहर की देन हैं। उनका कहना है कि यहां कुछ पंडितों द्वारा महिलाओं को हवन नहीं करने दिया जाता है। इस मिथक को दरकिनार कर वह खुद रोजाना हवन करती हैं और अन्य महिलाओं को भी प्रेरित करती हैं। इसके चलते कालोनी में उनकी अलग पहचान बनी है और अच्छे संस्कार का असर उनके बच्चों पर भी पड़ा है।
नहर की कलकल ध्वनि ने लुभा लिया
बिहार के मधुबनी (करीब 1100 किमी दूर) से दीपा करन यहां पांच साल पहले आ गई थीं। पति डॉक्टर पीके करन बृजलाल हॉस्पिटल में लेप्रोस्कोपिक एंड वेसकुलर सर्जन हैं। दीपा बताती हैं कि छह साल पहले जब वह घूमने आई थी, तब तिकोनिया में नहर की कलकलाहट सुकूनदेह लगी थी। सोचा कि कभी यहीं आकर बसूंगी।
पति के सेटलमेंट के बाद वैशाली कॉलोनी में फ्लैट लेकर बस गई, लेकिन दुख की बात है अब उस नहर को जगह-जगह ढका जा रहा है। हालांकि यहां के लोग मिलनसार और शांतिप्रिय हैं। बिहार और यहां के रीति-रिवाज भी मिलते-जुलते हैं। कहती हैं कि यहां अतिक्रमण और पार्किंग की समस्या को सुधारने की जरूरत है। मेन रोड पर स्ट्रीट लाइटों का न होना भय पैदा करता है।
बिहार के सीतामढ़ी (करीब 1050 किमी दूर) की सुचित्रा जायसवाल लायनेस क्लब के जरिए समाजसेवा के लिए जानी जाती हैं। वह शादी के बाद 1993 में यहां आईं। अभी वह मल्टीपल लायनेस की पीआर हैं। पति पंकज जायसवाल हल्द्वानी और लालकुआं में जगदीश रेस्टोरेंट चलाते हैं।
सुचित्रा कहती हैं कि शुरुआती दिनों में थोड़ी दिक्कत हुई, लेकिन बाद में मन लग गया। अब हल्द्वानी से बेहद लगाव हो गया है, लेकिन यातायात साधनों का अनुभव खट्टा रहा है। वह चाहती हैं कि हल्द्वानी से देहरादून के लिए ट्रेनों की संख्या बढ़े। एकमात्र ट्रेन जो चल रही है, उसका समय सही नहीं है। टाइम टेबल बदला जाना चाहिए। देहरादून जाने वाली एसी बसें भी अच्छी नहीं है।