बसंती देवी 60 वर्षीय बसंती देवी उत्तराखंड की प्रसिद्ध समाज सेविका हैं। उन्होंने राज्य में महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण संरक्षण, पेड़ों व नदी को बचाने के लिए अपना योगदान दिया है। 12 साल की उम्र में ही बसंती देवी का विवाह हो गया था और दो साल बाद ही उनके पति का निधन हो गया। जिसके बाद बसंती देवी कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम में रहने लगी। उन्होंने कोसी नदी का अस्तित्व बचाने के लिए महिला समूहों के माध्यम से जंगल को बचाने की मुहिम शुरू की।
साथ ही घरेलू हिंसा और महिलाओं पर होने वाले प्रताड़नाओं को रोकने के लिए जनजागरण किए। बसंती देवी ने अल्मोड़ा जिले के धौला देवी ब्लाक में आयोजित बालबाड़ी कार्यक्रमों में शामिल होकर समाज सेवा शुरू की। कौसानी से लोद तक पूरी घाटी में करीब 200 गांवों की महिलाओं का समूह बनाया। उन्होंने महिला सशक्तीकरण पर बल देते हुए साल 2008 में महिलाओं की पंचायतों में स्थिति मजबूत करने पर काम किया। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण मिला तो उन्होंने घरेलू हिंसा और पुरुषों की प्रताड़ना झेल रही महिलाओं की मुक्ति के लिए मुहिम शुरू की। 2014 में उन्होंने 51 गांवों की 150 महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद की।
1- सवाल: 2016 में राष्ट्रपति द्वारा आपको पहले नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया और अब पद्मश्री। कैसा महसूस कर रही हैं?
जवाब: सब लोग बधाई देने आ रहे हैं। कल से मुझे लगातार फोन भी आ रहे हैं। ये देख कर तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा है, कि इतने लोगों को मेरा नंबर मिल गया हैं। बहुत खुश हूं कि मेरे काम को सराहा गया है। पद्मश्री जैसे सम्मान के योग्य मुझे समझ गया, ये सिर्फ मेरे लिए ही नहीं है बल्कि उन सभी महिलाओं के लिए हैं, जो इस सफर में मेरे साथ जुड़ी रही। और जिन्होंने अपना जीवन बदलने की ठानी।
2- सवाल: आपको कब ये जानकारी मिली। और पहली प्रतिक्रिया आपकी क्या थी?
जवाब: मुझे जब लगातार लोगों के फोन आने लगे तब मुझे यकीन होने लगा। सबसे पहले मैंने अपने माता- पिता को याद किया। मेरी इस उपलब्धि पर सबसे ज्यादा खुश वही होते, लेकिन खुशी मनाने के लिए मेरे भाई बहन आज मेरे साथ है। क्योंकि कोविड की वजह से मैं आश्रम में नहीं थी कुछ समय से। इसलिए पिथौरागढ़ में अपने घर में रह रही हूं।
3- सवाल: बहुत कम उम्र से ही आप कांटों भरी राह पर चली हैं। आपने इसके लिए हिम्मत कैसे जुटाई
जवाब: 12 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई थी। दो साल बाद ही मेरे पति का निधन हो गया। लोगों के बहुत ताने सुने। सभी लड़कियों की शादी उस वक्त 10-12 साल में ही हो जाती थी। मेरे पिता ने मुझे तब सहयोग किया, जब मैं बिल्कुल अकेली पड़ गई थी। वही मेरी हिम्मत बने। उन्होंने मुझे पढ़ने के लिए कहा। गांव में जहां उस वक्त लड़कियों की पढ़ाने के बारे में कोई सोचता भी नहीं था। उस वक्त मेरे पिता ने कहा कि अब तुझे सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देना है। बस फिर आश्रम में जीवन शुरू किया। पढ़ाई शुरू की। महिलाओं, बच्चों के साथ भी काम करती रही। और फिर दोबारा शादी का ख्याल भी कभी जहन में नहीं आया।
4- सवाल: उत्तराखंड की महिलाओं और बेटियों को क्या संदेश देना चाहेंगी?
जवाब: मेरी उम्र आज 60 साल है। यहां तक आते -आते मैंने महिलाओं की पीड़ा को बहुत करीब से देखा है। घरेलू हिंसा वो झेलती हैं, लेकिन कुछ कहती नहीं। दिनभर काम में लगी हैं, लेकिन अपना कोई जीवन नहीं। मैं महिलाओं से यही कहना चाहूंगी कि वे अपनी क्षमता को समझें। किसी भी तरह की हिंसा को सहन न करें। मैं बेटियों को शिक्षित करने के लिए खासतौर पर कहूंगी। मेरे जीवन में मेरे पिता से मिले सहयोग के कारण मैं यहां खड़ी हूं। हर बेटी को इसी तरह के प्यार और सहयोग की जरूरत हैं।