तात्कालिक राहत के तुरंत बाद पुनर्निर्माण के लिए कदम बढ़ाने का दावा कर रही सरकार फिलहाल ठिठक-ठिठक कर आगे बढ़ती दिख रही है।
पहले राहत पर फोकस तो इसके बाद चार धाम यात्रा को शुरू करने की जिद के चलते पुनर्निर्माण का काम पूरी तरह से परवान नहीं चढ़ पाया। अब पुनर्निर्माण आगे बढ़ा भी है तो इसमें भी कई सवाल उठ खड़े हो रहे हैं।
जून 2013 की आपदा से पहले की करीब 25 हजार करोड़ की चार धाम यात्रा वैसे भी इस बार मुश्किल से 6900 करोड़ रुपए तक ही पहुंच पाई है।
उत्तराखंड सरकार ने पुनर्निर्माण का जो खाका तैयार किया है उसमें महत्वपूर्ण पड़ावों के लिए बेहतर और जल निकासी की व्यवस्था वाली सड़कें, भूकंपरोधी मकान, पटरी पर पर्यटन, व्यवस्थित चार धाम यात्रा, गांवों को बिजली, पानी की पूरी व्यवस्था, केदारधाम धाम को मॉडल टाउनशिप केरुप मे विकसित करने, चारों धामों केलिए वैकल्पिक मार्ग, नदियों की फ्लड जोन मैपिंग और आपदा की मार झेल सकने वाली संरचनाओं का विकास, आपदा प्रबंधन की विश्वस्तरीय व्यवस्था शमिल है।
तीन साल के समय की दरकार
इन सब कामों के लिए करीब तीन साल के समय की दरकार बताई जा रही है। विश्व बैंक और एशियन विकास बैंक से करार कर सड़क निर्माण की दिशा में सरकार कदम आगे बढ़ा भी चुकी है।
पर इस राह में अभी कई रोड़े है। हाल का सरकार का प्रदर्शन बता भी रहा है कि यह काम इतना आसान नहीं है।
पहले सरकार का फोकस किसी तरह से राहत और मुआवजे बांटने पर रहा और इसके बाद मई तक का समय चार धाम यात्रा को शुरू कराने में बीत गया।
अब सरकार पुनर्निर्माण का काम शुरू करने का दावा कर रही है पर इसमें भी राह आसान नहीं दिख रही है। सड़कों के निर्माण का काम अभी डीपीआर तक सीमित है।
पुलों के निर्माण का काम अभी शुरू नहीं
बाढ़ नियंत्रण के काम भी अभी पूरे नहीं हो पाए हैं। नदियों के फ्लड जोन की मैपिंग और बाढ़ को एक हद तक झेलने वाले पुलों के निर्माण का काम भी अभी शुरू नहीं हो पाया है।
पुनर्निमाण की राह पर आगे बढ़ने का दावा करने वाली सरकार आपदा से निपटने का तंत्र अभी विकसित नहीं कर पाई है। इसमें डाप्लर रडार से लेकर अन्य जरूरतों के लिए केंद्र का सिर्फ आश्वासन भर है।
अभी 27 गांवों को बिजली पहुंचाई जानी बाकी है। पुनर्निर्माण के केंद्र में केदारधाम है। यहां मॉडल टाउनशिप विकसित करने का वादा है। अभी तक केदारनाथ में भारी मशीने भी नहीं पहुंची है।
मलवा निस्तारण के लिए एक बार फिर सर्वे की बात सरकार कर रही है। एएसआई ने भी अभी केदार मंदिर के जीर्णोद्धार का काम शुरू नहीं किया है। मॉडल टाउन शिप बनाने के लिए पूरी टाउन प्लानिंग का काम भी अभी पूरा नही हो पाया है।
अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का भी वादा भी अधूरा
यही हाल सड़क और वैकल्पिक मार्ग निर्माण का है। सड़कों के नए अलाइमेंट की बात तो अभी सरकार कर ही नहीं रही है। वैकल्पिक मार्गों के लिए अभी सर्वे तक नहीं हुआ है।
पुनर्निर्माण में सरकार का दावा घाटी की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का भी वादा है। पर इस काम की योजना में ही फिलहाल संबंधित विभाग अटके हुए हैं।
पर्यटन में सबसे बुरा हाल है। घाटी की अर्थव्यवस्था इस पर अटकी हुई है। आपदा से पहले तक यह यात्रा करीब 25 हजार करोड़ रुपये की थी।
इस बार अभी तक यह यात्रा के वल 6900 करोड़ रुपए तक ही पहुंच पाई है। पनुर्निर्माण के तमाम दावे और चार धाम यात्रा पर फोकस के बावजूद आपदा प्रभावित घाटी का विश्वास पूरी तरह से सरकार वापस नहीं ला पाई।
ये था आपदा के बाद का हाल
- चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ आदि जिलों की करीब-करीब सारी सड़कें बंद हो गई थीं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जून 16-17 की आपदा में करीब डेढ़ लाख लोग फंस गए थे।
- 2679 आवासी घर पूरी तरह से ध्वस्त हुए थे।
- 2689 घर पूर्ण क्षतिग्रस्त, 11464 आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए थे।
- करीब 15 हजार पशुओं की मृत्यु हुई।
- सड़क, पुल, आवास सहित करीब 14 हजार करोड़ रुपए की सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ।
- करीब 6533 किमी ग्रामीण सड़क, 2183 किमी स्टेट हाइवे को नुकसान पहुंचा।
- 25000 करोड़ रुपए की चार धाम यात्रा एकदम पटरी से उतर गई।
- 4377 कस्बों और गांवों की बिजली व्यवस्था ठप हो गई।
- 5049 पेयजल योजनाओं को नुकसान पहुंचा।
योजना आयोग की ओर से खींचा गया पुनर्निर्माण का खाका
- भूस्खलन क्षेत्रों का सीमांकन, पुनर्निर्माण के लिए सुरक्षित क्षेत्रों का आकलन, ध्वस्त घरों, सड़कों, पुलों और संचार व्यवस्था का पुनर्निर्माण।
- सभी नदी घाटियों का भूवेज्ञानिक मैपिंग।
- भू उपयोग, इमरजेंसी संचार व्यवस्था को मजबूत करना, पर्यावरण केमानकों का पूर्ण पालन, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आजीविका।
- प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक रणनीति, संस्थानों का विकास, प्रभावित लोगों की क्षमता विकास, सुशासन।