कभी घरों के आंगन और इंसानी बस्ती के आसपास फुदकने वाली गौरैया अब बहुत कम देखने को मिल रही है। ग्रामीण इलाकों में नन्हीं गौरैया तो फिर भी कभी कभार देखने को मिल जाती है लेकिन देहरादून, मुंबई, नईदिल्ली, चंडीगढ़ जैसे देश के महानगरों में अब गौरैया देखने को नहीं मिल रही है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के पक्षी विज्ञानियों की मानें तो भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में पाई जाने वाली गौरैया विभिन्न मानवीय और वैज्ञानिक कारणों से तेजी से विलुप्त हो रही है। उत्तराखंड समेत देश के तमाम राज्यों में पिछले तीन दशकों में गौरैया की संख्या में इतनी कमी आई है कि रायल सोसायटी आफ बर्ड्स अतो भारत समेत दुनिया के कई देशों में गौरैया को रेड लिस्ट में शामिल कर दिया है। लेकिन अब जबकि अन्य पक्षियों के साथ ही कभी बहुतायत में पाई जाने वाली गौरैया तेजी से विलुप्त हो रही है तो इसके संरक्षण को लेकर भी कवायद तेज होने लगी है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के पक्षी विज्ञानियों की टीमें गौरैया के संरक्षण को लेकर जुट गई है। उत्तराखंड वन विभाग की ओर से गौरैया के संरक्षण को लेकर परियोजना की शुरुआत की गई है। जिसमें भारतीय वन्यजीव संस्थान के पक्षी विज्ञानियों की भी मदद ली जा रही है।
शहरी जीवनशैली में आए बदलाव से गौरैया की संख्या में आयी अप्रत्याशित कमी
पक्षी विज्ञानियों द्वारा किए गए शोध में यह बात सामने आई है कि गौरैया एक ऐसी चिड़िया है जो इंसानों के साथ रहना पसंद करती है। लेकिन जब इंसानों ने अपनी जीवनशैली में बदलाव किया तो गौरैया के अस्तित्व पर खतरा खड़ा हो गया। ग्रामीण इलाकों में गौरैया की स्थिति तो फिलहाल थोड़ी ठीक-ठाक है लेकिन शहरी जीवनशैली में आए बदलाव और कंक्रीट के बनते मकानों के चलते गौरैया का आशियाना तहस-नहस हो गया। ऐसे में गौरैया आशियाना नहीं मिलने और पर्याप्त भोजन की व्यवस्था नहीं होने के चलते पलायन कर गई। पक्षी विज्ञानियों द्वारा किए गए शोध से पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों में गौरैया की संख्या में 80 फ़ीसदी की अप्रत्याशित कमी आई है जो चौंकाने वाला पहलू है।
भारत समेत पूरे एशिया के साथ ही अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के तमाम देशों में पाई जाती है गौरैया
भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ पक्षी विज्ञानी डॉ सुरेश कुमार की मानें तो गौरैया एक ऐसा पक्षी है जो ना सिर्फ भारत में पायी जाती है, वरन एशिया महाद्वीप के तमाम बड़े देशों मसलन चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश श्रीलंका, नेपाल, म्यामार के अलावा अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, महाद्वीप के तमाम देशों में भी गौरैया की तमाम प्रजातियां पाई जाती हैं लेकिन पर्यावरण में आए बदलाव और इंसानों की बदलती जीवन शैली के सदस्य गौरैया पूरी दुनिया से तेजी से कम हो रही है।
भारत में हाउस स्पैरो समेत पायी जाती है छह प्रमुख प्रजातियां
भारतीय वन्यजीव संस्थान के पक्षी विज्ञानियों की मानें तो भारत में गौरैया की छह प्रमुख प्रजातियां पाई जाती हैं जिसमें हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड शी स्पैरो और ट्री स्पैरो प्रमुख है। इन सभी गौरैया की प्रजातियों में हाउस स्पैरो ऐसी प्रजाति है जिसके संरक्षण को लेकर पूरी दुनिया में विश्व गौरैया दिवस मनाया जा जा रहा है- जिसकी शुरुआत साल 2010 से की गई है।
आओ हम सब मिलकर बढ़ाए गौरैया का कुनबा- क्या करें, क्या ना करें
घर की छतों के साथ ही पार्कों और बालकनी में दाना डालने के साथ ही मिट्टी के पात्र में पानी भर कर रखें।
प्रजनन के समय गौरैया के अंडों की सुरक्षा करने में अपना योगदान दें।
घरों के आंगन में या बाहरी हिस्से में कनेर नींबू, अमरूद, अनार, चांदनी, मेहंदी का पेड़ लगाएं। ताकि गौरैया इन तीनों पर अपना आशियाना बना सके।
अपने घर के किसी हिस्से में बना बनाया खोसला लगाएं। ताकि गौरैया इसमें अपना आशियाना बना सकें।
गौरैया भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में तेजी से विलुप्त हो रही है। जो चिंताजनक पहलू है। भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में फसलों के उत्पादन में रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल से इनके जीवन पर असर पड़ा है। रही सही इंसानों बस्तियों में इनके घटने आशियानों ने पूरी कर दी है। गौरैया के संरक्षण को लेकर उत्तराखंड वन विभाग की मदद से शोध किया जा रहा है। जिसमें राज्य के मैदानी इलाको ंसे लेकर उच्च हिमालयी क्षेत्रोो में इनकी इकोलाजी को लेकर अध्ययन किया जा रहा है।
..डॉ. सुरेश कुमार, वरिष्ठ पक्षी विज्ञानी, भारतीय वन्यजीव संस्थान