एक कहावत ‘चवन्नी की मुर्गी 40 का मसाला’ उत्तराखंड के डांडा गांव के लोगों पर पूरी तरह मुफीद बैठती है।
दरअसल रोड नहीं होने से यहां की जिंदगी महंगाई के बोझ तले दबी है। स्थिति यह है कि 400 रुपए क्विंटल का नमक इस गांव में आकर 13 रुपए किलो के हिसाब से बिकता है। 325 रुपए का सीमेंट का कट्टा यहां पहुंचते-पहुंचते मय भाड़ा के 685 रुपए हो जाता है।
चंपावत विकासखंड के डांडा गांव की 800 की आबादी के लिए रोड या मोटर गाड़ी अंतरिक्ष में पहुंचने जैसा सपना है। खच्चर लोगों की आवाजाही और सामान ढुलान का एकमात्र जरिया है। 35 किमी के इस मार्ग का ढुलान 600 रुपए है, जिससे नमक, गुड़, आटा, चावल, दाल सहित ज्यादातर सामानों की कीमत बाजार से 80 से 130 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
अदरक, सब्जी और फलों के लिए मशहूर इस इलाके को उपज का लाभ नहीं मिल पा रहा है। रोड तक पहुंचाने के लिए भारी भाड़ा पैदावार को घाटे का सौदा बना रहा है। पशुधन यहां के लिए बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन पशुपालन केंद्र की व्यवस्था नहीं है।
प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूल हैं, पर इससे आगे की पढ़ाई के लिए पांच किमी दूर जाने की मजबूरी है। हालांकि विधायक हेमेश खर्कवाल कहते हैं कि वन विभाग की अड़चनें दूर हो गई है, अब रोड के काम में तेजी आएगी।
स्वास्थ्य सुविधा का अभाव
स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर उपकेंद्र है लेकिन यहां पुलिस चौकी बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि पैदल दूरी ज्यादा होने से एएनएम के दर्शन भी कभी कभार ही होते हैं। टीकाकरण का काम नियमित नहीं होता है।
टीवी, फोन कल्पना से परे
दुनिया फोर जी के जमाने में पहुंच गई है और यहां के लोग आज भी मोबाइल से कोसो दूर हैं। सामाजिक कार्यकर्ता प्रेम सिंह बोहरा ने कहा कि यहां मोबाइल नेटवर्क शून्य है, बिजली नहीं होने से टेलीविजन की दुनिया से यहां के लोग कटे हैं। यहां के बुजुर्गों के लिए ये सब बस सपना है।
डांडा गांव की परेशानी को जिला मुख्यालय से नहीं समझा जा सकता। रोड नहीं होने से अफसरों और बड़े प्रतिनिधियों की पहुंच नहीं होती। ज्यादा भाड़े की वजह से निर्माण की लागत बढ़ जाती है। रोड से कटे इलाकों के सरकारी निर्माण कार्यों के बजट में भाड़े की वास्तविक लागत को शामिल किया जाना चाहिए।
- खष्टी देवी, ग्राम प्रधान, डांडा