शादी के बाद सबसे पहले नवविवाहित जोड़ा उत्तराखंड के इस प्रसिद्ध मंदिर में जाना नहीं भूलता। मंदिर की खास मान्यता है कि शादी के बाद नवदंपत्ति को सबसे पहले इस मंदिर में आना चाहिए। यहां आशीर्वाद लेने से नवदंपति का जीवन सुखमयी होता है।
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धारी देवी
श्रीनगर से लगभग 14 किमी दूर बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर कलियासौड़ के समीप सिद्धपीठ मां धारी देवी मंदिर की वैसे तो कई मान्यताएं है। कहते है यहां जो भी सच्चे मन से मांगता है उसकी मुराद जरूर पूरी होती है।
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धारी देवी
न केवल क्षेत्र के लोगों की बल्कि देशभर से लोग मां धारी देवी के आशीर्वाद को यहां आते है। विशेष रूप से नवदंपतियों का यहां उनके दांपत्य जीवन के लिए सुखद माना जाता है।
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धारी देवी
गढ़वाल मंडल में तो, लोगों की मां धारी पर अपार आस्था है। न केवल नवदंपति बल्कि लोग घरों में किसी भी कार्य के शुभारंभ से पहले मां धारी का आशीर्वाद लेने जाते है। ईष्ट देवी और कुल देवी के रूप में श्रद्धालु मां धारी देवी की पूजा करते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार यहीं पर मां काली शांत हुई थी और तभी से यहां पर कल्याणी स्वरूप में मां की पूजा की जाती है।
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धारी देवी
सिद्धपीठ धारी देवी में जो श्रद्धालु सच्चे मन से मन्नत मांगते हैं मां धारी देवी उसे पूर्ण करती है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु पुन: यहां आकर घंटी और श्रीफल श्रद्धा से चढ़ाते हैं।
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धारी देवी
आदि शंकराचार्य ने भी यहां पर पूजा अर्चना की थी। पैदल मार्ग से जब चारधाम यात्रा हुआ करती थी तब श्रद्धालु अपनी यात्रा के सकुशल संपन्न होने को लेकर मां धारी देवी की विशेष पूजा अर्चना के बाद ही आगे बढ़ते थे।
ऐसा विश्वास है कि धारी देवी दिन में तीन रुप बदलती है। देवी सुबह कन्या, दिन में युवती और रात में वृद्धा का रुप धारण करती है। यहां लोग दूर दराज से मनौतियां मांगने आते हैं। शादी के बाद नवविवाहित जोड़े मां का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। मंदिर मे सुबह शाम देवी की आरती होती है। नवरात्रों के मौके पर यहां भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।