काम नहीं हुआ तो शिकायत कर दी
इतना ही नहीं भाई-भतीजावाद के इस खेल में तमाम नेताओं और अफसरों का नाम भी सामने आ रहा है, जिनकी सिफारिश पर तमाम अभ्यर्थियों का चयन कर लिया गया। इसमें कुछ नेता सीधे तौर पर सहकारिता से जुड़े हैं तो कइयों ने दूसरे नेताओं और अफसरों से सिफारिश लगवाई। इधर, इस मामले में सहकारिता से जुड़े अफसर अब कुछ भी कहने से बच रहे हैं। सहकारिता से जुड़े एक बड़े अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि कुछ नेताओं के रिश्तेदारों का चयन नहीं हुआ तो उन्होंने दूसरे नेताओं को साथ लेकर मुख्यमंत्री से मिलकर इस मामले में शिकायत कर दी। जबकि वह खुद अपने रिश्तेदारों को चयनित कराए जाने को लेकर सिफारिश लगवा रहे थे।
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जांच टीम ने दूसरे दिन खंगालीं पत्रावलियां
इस मामले में उप निबंधक अल्मोड़ा, नीरज बेलवाल की अध्यक्षता में जांच कर रही कमेटी ने दूसरे दिन जिला सहकारी बैंक देहरादून की पत्रावलियां खंगालीं। पहले दिन जांच टीम को प्रबंधन की ओर से सहयोग नहीं किए जाने की बात सामने आई थी। इस पर जांच टीम ने देर शाम प्रशासनिक भवन को सील कर दिया था। इस मामले में जांच में सहयोग नहीं करने पर महाप्रबंधक वंदना श्रीवास्तव की ओर से अनुभाग अधिकारी अमित शर्मा को निलंबित किया जा चुका है।
जांच के दायरे में आए जिलों में बदले जाएंगे एआर और जीएम : सचिव
सहकारिता विभाग की भर्ती में जांच के दायरे में आए जिलों में जिला सहकारी बैंकों के जिला सहायक निदेशक (एआर) और महाप्रबंधक (जीएम) बदले जाएंगे। सचिव सहकारिता मीनाक्षी सुंदरम ने बताया कि निष्पक्ष जांच के लिए शासन के स्तर पर यह फैसला लिया गया है। कहा कि इस मामले में शिकायत मिलने के तुरंत बाद एक समिति का गठन कर जांच शुरू करा दी गई है। जांच समिति को 15 दिन के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है। जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
पिछले तीन सालों में बैकडोर से भर्ती हो गए 250 से 300 कर्मी
राज्य निर्माण के बाद यह दूसरा मौका है, जब सहकारिता विभाग में सीधी भर्ती प्रक्रिया अपनाई जा रही है। इससे पहले वर्ष 2016-17 में भर्तियां हुईं थीं। तब भी हरिद्वार और अल्मोड़ा जिले में हुई भर्तियों के मामले में विवाद हुआ था, जो अब भी कोर्ट में विचाराधीन है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब बीते कई वर्षों से विभाग में भर्तियां ही नहीं हुईं, तो कामकाज कैैसे चल रहा था? विभाग के पुष्ट सूत्रों की मानें तो पिछले तीन सालों में बैकडोर से 250 से 300 संविदाकर्मियों को नियमित कर दिया गया। अगर इस मामले की भी जांच की जाए तो तमाम नए राज सामने आ सकते हैं।