दोपहर का समय था, हम लोग काठमांडू के सेंबूर मंदिर के बाहर खडे़ थे। ऊंचाई पर स्थित मंदिर के बाहर से काठमांडू शहर का खूबसूरत दृश्य दिखाई दे रहा था। हम फोटो खिंचवा रहे थे।
अभी मुश्किल से दो मिनट ही बीते थे कि मंदिर हिलने लगा, कुछ समझ में नहीं आया, क्या हो रहा है। तभी ड्राइवर (नेपाल निवासी) हमारे डेढ़ साल के बच्चे को लेकर भागते हुए बोला, भूकंप है भागो।
इसके बाद हम मंदिर से दूर भागे और इसी बीच मंदिर गिर गया। काठमांडू से लौटे माजरा निवासी मोहित जैन उस खौफनाक मंजर की तस्वीर को बयां करते हुए अभी भी बेचैन हो उठते हैं। उनका कहना है कि मंदिर में ड्राइवर भगवान के रूप में आया, जिसने हमारी जिंदगी बचा ली।
माजरा निवासी मोहित जैन चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और राजपुर रोड में उनका ऑफिस है। बीती 22 अप्रैल को मोहित अपनी पत्नी आकांक्षा जैन और डेढ़ वर्षीय बेटे पार्श्व के साथ नेपाल घूमने गए थे।
दो रात होटल के बाहर रहना पड़ा, लगते रहे झटके
23 और 24 अप्रैल को पोखरा घूमने के बाद वे परिवार सहित काठमांडू लौट आए। 25 अप्रैल की दोपहर मोहित परिवार सहित काठमांडू के सेंबूर मंदिर के दर्शनों के लिए गए थे। इसी बीच भूकंप आ गया।
बकौल मोहित, उस दिन समय रहते अगर ड्राइवर हमें वहां से नहीं निकालता तो अनहोनी तय थी। इसके बाद वापस होटल की ओर जाने लगे तो सड़कें जगह-जगह से टूटी हुईं थीं।
ड्राइवर गलियों से घुमा-घुमाकर ले गया, वहां भी रास्ता खराब हो गया था। होटल पहुंचे तो गेट बंद था, इसलिए बाहर ही खड़े रहे। होटल का गेट खुलने के बाद भी अंदर जाने नहीं दिया गया।
होटल के गार्डन में ही सभी को ठहराया हुआ था। दो रात वहीं रहना पड़ा। 27 को बमुश्किल स्पाइस जेट की फ्लाइट मिलने पर वापस आ सके। बताया कि हम ड्राइवर का ठीक से शुक्रिया भी नहीं कर पाए, किसी ट्रेवल एजेंसी से दो घंटे के लिए कार किराए पर ली थी।
ज्यादातर नेपाली भारत आने के इच्छुक
नेपाल में भूकंप के बाद खौफ का जबर्दस्त मंजर है। जिलाधिकारी दीपेंद्र कुमार चौधरी ने बताया कि काफी संख्या में वहां रह रहे नेपाली भी भारत आने के इच्छुक हैं। ये लोग सुरक्षा और खाने-पीने की व्यवस्था के चलते नेपाल छोड़ना चाहते हैं। अलबत्ता जिला प्रशासन राहत संबंधी आगे का कोई भी कदम शासन के निर्देश पर ही उठाएगा।
नेपाल में उत्तराखंड के फंसे लोग पहुंचेंगे आज
काठमांडू और नेपाल के अन्य भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में फंसे भारतीयों को लाने का काम चंपावत प्रशासन ने शुरू कर दिया है। यहां से गई उत्तराखंड रोडवेज की 25 बसों में उत्तराखंड के अलावा उप्र, बिहार, उड़ीसा और बंगाल के लोगों को लाया जा रहा है। ये लोग रक्सौल बार्डर के रास्ते लाए जा रहे हैं। इनके काठमांडू से बृहस्पतिवार शाम तक पहुंचने की उम्मीद है।
चंपावत जिले से एसडीएम नरेश दुर्गापाल के नेतृत्व में 27 अप्रैल को एक टीम बनबसा से काठमांडू को रवाना हुई थी। रोडवेज की 25 बसों के साथ गई ये टीम वहां फंसे उत्तराखंड और अन्य राज्यों के लोगों को लेने गई। इनमें से ज्यादातर लोग वहां रहते थे।
जिलाधिकारी दीपेंद्र कुमार चौधरी ने बताया कि काठमांडू पहुंचने के बाद टीम ने भारतीय दूतावास से संपर्क किया। दूतावास के निर्देश पर वापस आने के इच्छुक उत्तराखंड के लोगों को बस स्टेशन और एयरपोर्ट पर लाउडस्पीकर से जानकारी दी गई। वापस आने के इच्छुक उत्तराखंड के 100 लोग मिले, जिन्हें दो बसों में लाया जा रहा है।
दूतावास के निर्देश पर उप्र, बिहार, उड़ीसा, बंगाल के वापस आने के इच्छुक लोगों को 23 बसों से लाया जा रहा है। उत्तराखंड और अन्य राज्यों के लोगों को काठमांडू से बुधवार शाम को रक्सौल के रास्ते रवाना किया गया।
डीएम ने बताया कि अन्य राज्यों के यात्रियों को रक्सौल तक छोड़ने के बाद उत्तराखंड रोडवेज की बसें वापस यहां आ जाएंगी, जबकि उत्तराखंड के यात्रियों को बनबसा तक लाया जाएगा। इन यात्रियों के बृहस्पतिवार शाम तक वापस पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।