इन्हीं सब के भरोसे तिवारी उत्तराखंड में पांच साल निश्चिंत होकर सरकार चलाने में सफल रहे थे और राज्य गठन के 16 वर्षों में अकेले ऐसे सीएम रहे जो पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर सके।
हालांकि मार्च 2006 में उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की थी जो स्वीकार नहीं की गई। सपा नेता मुलायम सिंह यादव हमेशा उनके घनिष्ठ रहे, अटल बिहारी वाजपेयी, राजनाथ सिंह, शरद पवार सहित अन्य दलों के नेताओं से उनके प्रगाढ़ संबंध रहे।
सतपाल महाराज और अर्जुन सिंह के साथ तो तिवारी ने 1996 में कांग्रेस छोड़कर अखिल भारतीय इंदिरा कांग्रेस (टी यानी तिवारी) पार्टी भी बनाई थी और इस पार्टी के कोटे से महाराज को केंद्र में रेल राज्यमंत्री बनवाया था। बाद में सोनिया गांधी के कांग्रेस की कमान संभालने के बाद वे फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए थे।
एक दौर था जब जिस पर तिवारी हाथ रख देते राजनीति में उसका सितारा बुलंद हो जाता था। राजनीति में अनाम से रहे स्व. सत्येंद्र गुड़िया को सांसद और पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में पीडीएफ के हरीश दुर्गापाल को बमेटा बंगर के ग्राम प्रधान से सीधे विधायक बनवा देने का श्रेय भी तिवारी को है।
हल्द्वानी, लालकुआं, रामनगर, काशीपुर, जसपुर, किछा, कालाढूंगी, भीमताल नैनीताल सहित यूपी के बहेड़ी (बरेली), लखनऊ और दिल्ली तिवारी की कर्मस्थली रहे।
यह संयोग है कि 1952 में तिवारी मात्र 27 वर्ष की उम्र में यूपी में सबसे कम उम्र के विधायक बने थे और 92 वर्ष की आयु तक सर्वाधिक वयोवृद्ध सक्रिय राजनीतिज्ञ भी रहे।
1976-77, 1984, 85 और 1988-89 में चार बार यूपी में और एक बार 2002 से 2007 तक उत्तराखंड में सीएम रहे। तिवारी ऐसे अकेले नेता थे जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री रहे।
तिवारी का जन्म 18 अक्टूबर 1925 को नैनीताल के बल्यूटी गांव में हुआ था। सात वर्ष की आयु में उनकी माता चंद्रा देवी का निधन हो गया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पदमपुरी, हल्द्वानी, बरेली और नैनीताल में हुई।
उन्होंने नैनीताल के सीआरएसटी से हाई स्कूल प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया और उसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए किया, जिसमें वह टॉपर रहे। फिर वहीं से एलएलबी भी किया। 1947 में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे।