रहस्य, रोमांच और धार्मिक भावनाओं से भरी श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा विदेशी मीडिया के लिए भी रहस्य बनी है। 18 अगस्त से शुरू हुई श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा की घटनाओं को विदेशी मीडिया अपने कैमरों में कैद कर रहा है।
गढ़वाल के नौटी, कुरूड़ सहित कुमाऊं के नैनीताल और अल्मोड़ा से शुरू हुई एशिया की सबसे लंबी पैदल यात्रा के धार्मिक महत्व और रहस्यों से भरी इस यात्रा की कवरेज विदेशी मीडिया भी पूरी मेहनत से कर रहा है।
यात्रा में शामिल पोलैंड की महिला पत्रकार मारफा ने कहा कि वह नौटी से ही यात्रा के साथ हैं। मारफा कहती हैं कि सातवें पड़ाव नंदकेशरी में कुमाऊं और गढ़वाल की देव छंतोलियों का मिलन अद्भुत रहा
कहा कि जैसे-जैसे राजजात यात्रा अपने अगले पड़ावों पर पहुंच रही है। वैसे ही इस यात्रा और यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं, देवताओं और अंतिम पड़ाव में यात्रा के समापन की जानकारी उनके लिए महत्वपूर्ण बनती जा रही है।
महिला पत्रकार के साथ यहां पहुंचे दिल्ली के मुकेश कुकसाल ने कहा कि स्थानीय देवी देवता, ग्रामीणों के रीति-रिवाज उनकी जिज्ञासा को बढ़ा रहे हैं।
प्रकृतिमय हो गई मां नंदा देवी
खेतों के बीच बसे खूबसूरत गांव फल्दिया से चलकर देर शाम नंदा करीब डेढ़ सौ छंतोलियों के साथ मुंदोली गांव पहुंच गई। यहां पर गांव के भूम्याल देवता द्यो सिंह और भगवती का प्राचीन मंदिर है। नंदा से इनका मिलन हुआ।
रास्ते के पिलखणी गांव में सिरई के पेड़ के नीचे बने पिलखणी देवी के मंदिर पर पहुंचकर नंदा ने अपने एक दूसरे ही स्वरूप का परिचय दिया। मान्यता है कि यहां पर देवी ने पिलवा नाम के दैत्य का वध किया था।
फल्दिया से कुछ ऊंचाई पर स्थित इस पिलखणी गांव में बसंती देवी की आवाज में नंदा के जागर गूंज रहे थे। बसंती देवी की मां बिरमा देवी ने नंदा की कथा अपनी कांपती पर लयबद्व आवाज में सुनाई तो पूरा माहौल ही बदल गया।
फल्दियागांव से कांडई, पिलखणी, ल्वाणी, बगड़ीगाड़ होते हुए देवी की यात्रा अपने 11वें पड़ाव मुंदोली पहुंची। ल्वाणी जागर गायिका बसंती देवी का गांव भी है। नंदा के जागर को बसंती देवी ने अपनी आवाज में पिरोकर कैल की इस पूरी घाटी में गुंजायमान कर दिए हैं।
फल्दियागांव में बुधवार की रात को देवी के स्वागत में शायद ही कोई घर सोया रहा हो। लोगों ने यात्रियों के लिए अपने घरों के दरवाजे खोल दिए थे और खुद देवी की स्तुति में चौंफला और अन्य नृत्य गीत में खोए रहे। नंदा की यात्रा अब एक ऐसे क्षेत्र में है, जहां चौंफला, थड्या, चांछड़ी और झोड़ा जैसे पारंपरिक नृत्य घर- घर की पहचान है।
पारंपरिक रूप से कर रहे हैं देवी का स्वागत
लोगों का स्वभाव सीधा और सरल है। बांज से भरे जंगलों के बीच बसे हुए ये गांव साधन संपन्न है और पलायन की विभीषिका से कोसों दूर है। गांव के लोग डीजे और शोर करने वाले गीत-संगीत से दूर पारंपरिक रूप से ढोल-दमाऊं और जागर के जरिये ही देवी का स्वागत कर रहे हैं।
पिलखणी गांव में पिलखणी देवी के मंदिर को छाया देता सुरई का पेड़ आध्यात्मिक और प्राकृतिक रूप से गांव के प्रवेश को एक अलग आभामंडल से भर देता है। गांव के नरेंद्र राम के मुताबिक गांव में जब भी पूजा-अर्चना होती है, इसी पेड़ की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है।
नंदा की यह यात्रा अब हिमालय के ऐसे क्षेत्र में है, जहां प्रकृति और समाज एक दूसरे से घुले-मिले हैं। गांव की सामाजिक और आर्र्थिक व्यवस्था पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है। ऐसे में गांवों की लोक संस्कृति पूरी तरह से नंदामय है। नंदा प्रकृति का ही रूप है। जीवंत रूप में नंदा घर की बेटी से लेकर बहू तक के रूप में रहती है।
नंदा के जागर इसी जीवंत रूप को सामने रख रहे हैं। अब ये यात्रा शुक्रवार 28 अगस्त को वाण पहुंचेगी। वाण में लाता से आई देवियों के साथ ही अन्य देवी-देवताओं का मिलन भी नंदा के साथ होगा। वाण से आगे की यात्रा एक संयुक्त रूप ले लेगी। हिमालय की सुंदरता और दुर्गमता का बोध एक साथ अब इस यात्रा की पहचान होगी।