3 सितंबर 2000 को श्रीनंदा राजजात अंतिम बस्ती पड़ाव वाण से विदा होते हुए गैरोली पातल के लिए निकली। सुबह से ही रिमझिम बारिश हो रही थी। चिकनी मिट्टी वाले रास्ते पर कई लोगों के चलने से फिसलन बढ़ने लगी थी। ऐसे में नंदा भक्त संभलकर आगे बढ़ रहे थे।
तब 2000 लोग थे यात्रा के साथ
प्रात: 9 बजे के करीब नंदा लाटू मंदिर पहुंची। यहां पर वह अपने धर्म भाई लाटू से मिलने के बाद लगभग पौने ग्यारह बजे लाटू की अगुवाई में गैरोली पातल के लिए आगे बढ़ी। रणकधार से आगे बढ़ते हुए कैल गंगा को पार कर कई घुमावदार चढ़ाई वाले रास्तों से देर शाम नंदा अपने पहले निर्जन पड़ाव गैरोली पातल पहुंची थी।
वर्ष 2000 की यात्रा में रहे केदारदत्त जोशी, प्रकाश डिमरी, गजेंद्र नौटियाल बताते हैं कि दिनभर बारिश से यात्री पूरी तरह से भीग गए थे। यात्रा में करीब दो हजार लोग थे।
इस बार पहुंचे दस हजार
इस वर्ष शनिवार को सुबह से ही मौसम का मिजाज बदला रहा। हल्की बूंदाबांदी के बीच मां नंदा को वाण से विदा किया गया। अपने भाई लाटू की अगुवाई में यात्रा जैसे ही गैरोली पातल के लिए आगे बढ़ी, बारिश की फुहारें तेज होती गई।
कुरूड़ की नंदा की डोली अन्य देवी डोलियों और छंतोलियो के साथ करीब चार बजे गैरोली पातल पहुंची। वाण से करीब 10 हजार से अधिक भक्त भी पहुंचे हैं।
बेदनी के लिए बढ़ गई लाता की भगवती
लाता की भगवती ने गैरोली पातल में नहीं रुकी। देवी की डोली सीधे बेदनी के लिए निकल गई। भगवती की डोली 88 वर्ष के बाद यात्रा में शामिल हुई है। डोली के साथ ढाई सौ भक्त भी हैं।