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फल्दिया में बरसे बदरा, भीगीं मां नंदा

Thu, 28 Aug 2014 03:04 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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राजजात के दसवें दिन मां नंदा अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ कैल नदी के किनारे बसे फल्दिया गांव में देर शाम पहुंचीं।
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मां नंदा के भक्तिरस में पहले से ही भीग रहे श्रद्धालुओं को जब इंद्र ने भिगोया तो सभी के तन-मन खिल उठे। यात्रा का यह पहला गांव है जिसने नंदा भक्तों के लिए दरवाजे खोले हुए हैं। गांव में भंडारे का आयोजन किया गया है।

खाना बनाने के लिए जुटी है पूरे गांव की महिलाएं
पूरे गांव की महिलाएं यात्रियों के लिए खाना बनाने के लिए जुटी हुई हैं। हरियाले खेतों में लहलहाती फसल के बीच में बसा यह खूबसूरत गांव जैसे नंदा के स्वागत के लिए आत्मिक रूप से पूरी तरह तैयार है। राज छंतोलियां यहां पहले पहुंचीं और नंदा की डोली बाद में।
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यात्रा का यह वाण और मुदोली से पहले का पड़ाव है। नंदकेशरी से राजछंतोलियां पहले निकली थीं और नंदा की डोली बाद में। अल्मोड़ा की नंदा देवी ने भी बाद में ही आगे की ओर रुख किया।

नंदकेशरी से कुछ दूरी पर स्थित देवाल पहुंचते-पहुंचते नंदा के साथ कई और नंदा भक्त जुड़ गए। नंदा का स्वभाव शांत है पर मिलने-जुलने वह निराश नहीं करती। छंतोलियों के लेकर चल रहे लोगों के जख्म पर नंदा का यह स्वभाव ही मरहम लगा रहा है।

नंदकेशरी से लेकर फल्दिया गांव तक का पूरा रास्ता पैदल का है। तारकोल की सड़क पर पैदल और नंगे पांव बढ़ना इनके लिए खासा कष्टदायक साबित हो रहा है। पर परंपरा की डोर से बंधी ये छंतोलियां लगातार आगे बढ़ रही हैं।

फल्दिया के ठीक सामने ऊंचाई पर लोस्तरी है और इसके सामने स्वार। स्वार गांव ही है जहां हर परिवार की तीन से ज्यादा पीढ़ियां फौज में रहकर देशसेवा कर चुकी हैं। कैल नदी का पानी साफ है मगर इसमें पिंडर जैसी तेजी नहीं है।

इसी फल्दिया गांव में नंदा ने डेरा डाला है। गांव में मां कालिंका का देव स्थान है। काली नंदा की बड़ी बहन भी कही जाती है। नंदा ने गांव में पहुंचते ही अपनी बहन से भेंट की। यही गांव है जहां यात्रियों को गढ़वाल की ठेठ संस्कृति भी देखने को मिली।

देवी की स्तुति में झोड़ा, चाछरी, झुमेलो के साथ ही देवी के जागर गांव में गूंजे। गाड़ियों के शोर से दूर यह गांव नंदा की स्तुति में अपने अंदाज में लीन है।

नंदा की एक और कथा
कथाओं के इस देश में नंदा भी एक कथा है। एक कथा से जुड़ी कई कथाएं। एक धारा से निकली कई धाराएं। नंदा के जागर के बीच में भी नंदा की एक कथा है जो फल्दिया गांव में सुर और लय में बंध में दीये की तरह रोशन हो गई।

नंदा की इस कथा में लोक जात की कथा है। यह कथा बताती है कि नंदा को इस बात से नाराजगी थी कि उसकी अन्य बहनों को तो बेहद संपन्न प्रदेश में ब्याहा गया पर उसे निर्मम कैलास में भेज दिया गया। नंदा की इस नाराजगी को देखते हुए भाई लाटू नंदा को मनाने की कोशिश कर रहा है।

नंदा की नाराजगी को दूर करने के लिए ही जात का आयोजन है। इस जात का निमंत्रण तिब्बत के लिए है तो हिमांचल के लिए भी। हूण प्रदेश के लिए भी यह निमंत्रण भेजा गया है। नंदा कैलास की ओर जा रही है और सारे देवताओं का इसमें आह्वान है।

सारे देवता इस जात में शामिल हो रहे हैं। नंदा की यह कथा आध्यात्मिक रंग से ओत-प्रोत होते हुए भी सामाजिक ताने-बाने में बुनी हुई है।

जात में व्यवस्था की जिम्मेदारी होती थी राजा की
गढ़वाल और कुमाऊं के चारों कोनों को जोड़ रही नंदा की जात पर परंपरा के ऊपर व्यवस्था हावी है। पर व्यवस्था के नाम पर हो रही परेशानी का विरोध गांव के सीधे-साधे लोग नहीं कर रहे हैं। शायद यह जात की परंपरा और लोगों के विश्वास के कारण है।

जगह-जगह गाई जा रही जागरों पर विश्वास करें तो जात पूरी तरह से राजा की व्यवस्था पर निर्भर थी। नंदा के भक्तों को कैलास तक पहुंचाने के लिए राजा खुद ही सारे इंतजाम करता था।

मुख्य पड़ावों पर बलि होती थी, तो इसका इंतजाम भी राजा के जिम्मे होता था। लोगों के रहने, खाने और ठहरने की पूरी व्यवस्था राजा ही करता था और पंडितों को पुरोहितों के लिए दान-दक्षिणा की व्यवस्था भी वही करता था।
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मौजूदा समय में सरकार की व्यवस्था को राज व्यवस्था के तौर पर स्वीकार किया जा रहा है। क मियों को खुलकर उजागर नहीं किया जा रहा है।

यात्रा में शामिल और आधुनिक ता से परिचित हो चुके यात्री जरूर प्रशासन की भूमिका और व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं। पुलिस का जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप सबको अखर रहा है।
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