ईड़ा बधाणी और नौटी के बीच का छोटा सा गांव है जाख। ईड़ा बधाणी से सीधी दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पार कर नंदा यहां पहुंचीं हैं।
गांव पर पलायन की छाया कम
सड़क से थोड़ी दूर पर भरापूरा गांव। नंदा का स्वागत करने के लिए उमड़े गांव वालों की संख्या बता रही है कि गांव पर पलायन की छाया कम पड़ी है। गांव पर नंदा का आशीर्वाद है शायद। खेतों में फसल लहलहा रही है।
गांव में पानी की कोई कमी नहीं है। हजारों की तादाद में यात्रियों के साथ शामिल मैं इस गांव की खूबसूरती को निहारता रह गया। गांव के एक छोर पर मणी खाल है तो दूसरे छोर पर एक बड़े से तुन पेड़ की छाया में बना शिवालय।
गांव वालों के मुताबिक पेड़ दो से तीन सौ साल पुराना है। हरियाले खेतों के बीच नंदा की लाल रंग की छंतौली और यात्रियों की लंबी कतार गांव की खूबसूरती में एक अलग ही रंग घोलती है।
नंदा के दुख दर्द का साक्षी बन रहा गांव
नंदा ने सदियों पहले इस गांव से होकर यात्रा की होगी। तब से नंदा हर बार राजजात में इस गांव से होकर जाती है। नंदा की बारह साल की जात के सहारे ही यह गांव शायद पहाड़ की कठिनाइयों में भी जिंदगी का हौसला बनाए हुए है।
नंदा को पता है कि पहाड़ का दुख-दर्द क्या होता है। यात्रा का हर गांव नंदा के इस दुख दर्द का साक्षी भी बन रहा है। इसी बहाने गांव की बहू-बेटियां अपना दुख-दर्द भी साझा करती हैं।
यात्रा में ही नंगे पांव शामिल एक बुजुर्ग महिला ने मुझे इसका मर्म समझाया। कहा-इन यात्रा क्या ह्वै जैमा क्वी कष्ट ही नी (वह यात्रा ही क्या जिसमें कष्ट न हो)।
ऊंचे पहाड़ों की यात्रा में एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक बीच के ग्रामीण शामिल होते ही हैं। नंदा की यह यात्रा पहाड़ की महिलाओं की ही यात्रा है।
हर गांव में नंदा के स्वागत में महिलाएं उमड़ रही हैं। पुरुष भी स्वागत में शामिल हैं पर उनकी भूमिका व्यवस्था बनाने तक की है।
मैन त रुद्रप्रयाग जाण हे दिदी
यात्रा सपाट सड़कों से कई जगह होकर गुजरती है। ऐसे में दूर-दराज की महिलाएं इस कोशिश में भी रहीं कि गाड़ी के जरिए सड़क पर नंदा से भेंट कर ली जाए।
दियारकोट मे ऐसी ही एक महिला सड़क पर नंदा की छंतौली का इंतजार करती मिली। उन्हें रुद्रप्रयाग लौटना था। उन्हें घर में बंधी गाय भैंसों की चिंता भी थी। देर होती तो गाय को चारा कौन देता।