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मसूरी गोलीकांड : नहीं भूल पाए दो सितंबर को मिला वह जख्म, छह आंदोलनकारियों ने दिया था बलिदान

Wed, 02 Sep 2020 12:29 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, मसूरी
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मसूरी गोलीकांड - फोटो : File Photo
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दो सितंबर 1994 की वह सुबह पलभर में ही कितनी दर्दनाक बन गई थी, उस जख्म को कोई नहीं भूल पाएगा। अलग प्रदेश के लिए मौन जुलूस के दौरान छह आंदोलनकारियों ने अपना बलिदान दिया था। आज आंदोलनकारी इस बात को लेकर खफा हैं कि उनके सपनों का उत्तराखंड नहीं बन पाया।
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मसूरी गोलीकांड की 26वीं बरसी आज: शहीद स्थल पर पहुंचे बड़े नेता, शहीदों को दी श्रद्धांजलि

एक सितंबर 1994 को खटीमा में पुलिस ने राज्य आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसाईं थीं। इसके बाद एक सितंबर की रात ही संयुक्त संघर्ष समिति ने झूलाघर स्थित कार्यालय पर कब्जा कर लिया था और आंदोलनकारी वहां क्रमिक धरने पर बैठ गए थे। जिनमें से पांच आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया था। इसके विरोध में दो सितंबर को नगर के अन्य आंदोलनकारियों ने झूलाघर पहुंचकर शांतिपूर्ण धरना शुरू कर दिया।
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यह देख रात से ही वहां तैनात सशस्त्र पुलिसकर्मियों ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के आंदोलनकारियों पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इसमें छह आंदोलनकारी शहीद हो गए थे। यहां आंदोलन का नेतृत्व कर रहे वृद्ध नेता  हुकुम सिंह पंवार को पुलिस दो सितंबर को बरेली जेल ले गई। जुलूस में उनके युवा पुत्र एडवोकेट राजेंद्र सिंह पंवार को गोली लगी और वे बुरी तरह जख्मी हो गए थे। 
 

क्या कहते हैं आंदोलनकारी 

- आंदोलनकारी और सीबीआई का मुकदमा झेलने वाली सुभाषिनी बर्त्वाल ने बताया कि अलग राज्य के निर्माण को लेकर उनके जैसे कई आंदोलनकारियों ने आवाज उठाई थी, लेकिन उनके सपनों के उत्तराखंड का निर्माण नहीं हो सका। न ही आज तक कई आंदोलनकारियों को उनका हक मिल सका है। 

- वरिष्ठ आंदोलनकारी जयप्रकाश उत्तराखंडी कहते हैं कि मसूरी की मालरोड झूलाघर के पास राज्य आंदोलनकारी दो सितंबर 1994 को खटीमा गोलीकांड के विरोध में नारेबाजी कर रहे थे लेकिन पुलिस ने आंदोलन को कुचलने के लिए पहले से ही तैयारी कर ली थी। लोग नारेबाजी कर रहे थे कि पुलिस ने लाठियां बरसाने के साथ ही गोली चलानी शुरू कर दी थी। 

- राज्य आंदोलनकारी डॉ. हरिमोहन गोयल ने बताया कि जल, जंगल, जमीन और पहाड़ से पलायन के मुद्दे को लेकर राज्य की लड़ाई लड़ी गई थी लेकिन आज सभी मुद्दे नेताओं की महत्वाकांक्षा के सामने गुम हो गए हैं। 

- राज्य आंदोलनकारी पूरण जुयाल ने बताया कि राज्य सिर्फ नेताओं की ऐशगाह बन गया है। अलग राज्य बनने के बाद आठ मुख्यमंत्री बन चुके हैं लेकिन पहाड़ के विकास के लिए कोई भी गंभीर नहीं है। पलायन जारी है। कोई ठोस नीति नहीं बनी है। 

- राज्य आंदोलनकारी मंच के जिलाध्यक्ष प्रदीप कुकेरती ने कहा कि राज्य के शहीदों और आंदोलनकारियों के अनुरूप उत्तराखंड नहीं बन पाया और न ही शहीदों के हत्यारों को आज तक सजा मिल पाई है।
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मसूरी गोलीकांड के शहीद

- बेलमती चौहान (48) ग्राम खलोन, पट्टी घाट, अकोदया, टिहरी
- हंसा धनई (45) ग्राम बंगधार, पट्टी धारमंडल, टिहरी
- बलबीर सिंह नेगी (22) लक्ष्मी मिष्ठान भंडार, लाइब्रेरी, मसूरी
- धनपत सिंह (50) ग्राम गंगवाड़ा, पट्टी गंगवाड़स्यूं, टिहरी
- मदन मोहन ममगाईं (45) ग्राम नागजली, पट्टी कुलड़ी, मसूरी
- राय सिंह बंगारी (54) ग्राम तोडेरा, पट्टी पूर्वी भरदार, टिहरी 
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